एटा। शहर के पर्यावरणविद ज्ञानेंद्र रावत ने कहा कि चैत्र मास की प्रतिपदा को रंगों का त्योहार होली है। इस पर्व पर रंगों से खेलने का एक अलग ही आकर्षण होता है। होली के दिन अलग-अलग रंगों से होली खेलने से जहां ग्रहों की प्रतिकूलता और नकारात्मकता दूर होती है, वहीं सकारात्मकता ऊर्जा में भी वृद्धि होती है।
उन्होंने बताया कि यह काल ऋतुओं का संक्रमण काल भी है और इस दौरान संक्रामक रोग भी विकसित होते हैं। मान्यतानुसार होली पर प्राकृतिक रंग जो रोगों से रक्षा भी करते हैं। उन्हें होली खेलने की सलाह दी जाती है। इसका अहम कारण यह है कि ये रंग जहां आसानी से घुल जाते हैं वहीं त्वचा को नुकसान भी नहीं पहुंचाते हैं। जबकि रसायन युक्त कृत्रिम रंग जिनमें हैवी मैटल्स जैसे लैंड पारा क्रोमियम आदि मिले होते हैं। त्वचा में खुजली, एलर्जी और सूजन के साथ साथ नेत्र रोग जैसे आंखों में जलन का कारण भी बनते हैं। कभी-कभी इनसे अंधेपन का भी खतरा बना रहता है। इसलिए होली खेलते समय विशेष सतर्कता बरतें और प्राकृतिक हर्बल रंगों से ही होली खेलें।