विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी यदि मानकों पर खरे न उतर रहे हों, तो मतदाताओं ईवीएम में नन ऑफ द एवव (नोटा) का बटन दबाने का मौका मिलेगा। तीन साल पहले हुए लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में भी आयोग मतदाताओं को नोटा का विकल्प दे रहा है।
जिला सहायक निर्वाचन अधिकारी बिजेंद्र भारती ने बताया कि वोट न देने के संबंध में कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रुल्स 1961 में कानून बना है। लोकसभा चुनाव 2014 में पहली बार नोटा का प्रयोग हुआ। अब विधानसभा चुनाव 2017 के लिए भी चुनाव आयोग वीडियो कांफ्रेंसिंग में लगातार नोटा विकल्प के बारे में मतदाताओं को जागरूक करने के निर्देश दे रहा है। इसे लेकर सियासी दल चिंतित हैं। हालांकि भाजपा जिला अध्यक्ष दिनेश वाशिष्ठ, कांग्रेस जिला अध्यक्ष चोबसिंह धनगर, बसपा जिला अध्यक्ष अखिलेश दिनकर, सपा जिला अध्यक्ष अशरफ हुसैन ने इसका स्वागत किया है।
लोकसभा चुनाव मेें 3150 ने चुना था नोटा
संसदीय चुनाव 2014 में जिले की चार विधानसभा क्षेत्रों में कुल 3150 लोगाें ने नोटा का प्रयोग किया था। इसमें अलीगंज क्षेत्र में 302, जलेसर में 508, एटा सदर में 1194, मारहरा में 1144 मतदाता शामिल रहे।
ये नियम नहीं हो पाए थे लागू
निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि नोटा को लेकर नियम तो थे, लेकिन उनका पालन लोकसभा चुनाव 2014 से पूर्व प्रभावी तौर पर नहीं हुआ। पूर्व में नियम था कि मतपत्र लेने या फिर ईवीएम के सामने जाने के बाद भी मतदाता वोट डालने से मना कर सकता था। इसकी जानकारी उसे पीठासीन अधिकारी को देनी थी, जो उसे रजिस्ट्रर में दर्ज करता। खास बात यह थी मतदाता को मतपत्र लेने या फिर ईवीएम के पास जाने पर ही हस्ताक्षर करने होते थे। वोट नहीं डालने वाले को दो बार हस्ताक्षर करने के नियम थे।