देश की सुरक्षा के लिए जिन परिवारों के लाडलों ने अपनी जान गवाई उन परिवारों और वीर जवानों की शहादत को जिला प्रशासन ने भुला दिया है। आलम यह है कि शहादत के वक्त जिन सुविधाओं की घोषणा हुई वे अभी तक परिवारों को मुहैया नहीं हुईं। शहीदों के परिवार केंद्र सरकार में ड्यूटी करने के एवज में जो कुछ मिला परिवार उसी से गुजारा करने को मजबूर हैं। यही नहीं जिला प्रशासन शहीदों के स्मारक तक नहीं बना पाया। परिवारों ने अपने लाडलों की याद में खुद ही स्मारक बनवाए।
मिरहची क्षेत्र के रामई निवासी 23 वर्षीय मनवीर शाह विगत 26 दिसंबर, 2012 को सुकमा के नक्सली हमले में शहीद हुए थे। पिता वेदपाल ने कहा बेटे की शहादत पर प्रशासन ने कई वादे किए, लेकिन बाद में सब भूल गया। परिवार को गांव में अभीतक भूमि का पट्टा नहीं मिला और न ही अंतेष्टि स्थल बनाया गया। पिता ने बेटे की याद में अपनी भूमि पर अपने पैसे से स्मारक बनवा कर मूर्ति अनावरण कराया, लेकिन प्रशासन ने शहीद के नाम पर सड़क तक बनवाई। पिता ने कहा विधायक निधि से शहीद द्वार बना, लेकिन द्वार पर विधायक का नाम बड़े शब्दों में और शहीद का छोटे शब्दों में लिख कर खानापूर्ति कर दी गई। वेदपाल की माने तो भूमि पट्टा, स्मारक, अंतेष्टि स्थल के लिए वे कई बार तत्कालीन डीएम से मिले, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। शहीद के पिता ने बेटे के स्मारक पर शौचालय, पेयजल, रोशनी, कुर्सी की व्यवस्था कराने की मांग की है।
घिलौआ निवासी 22 वर्षीय पुष्पेंद्र कारगिल युद्ध में 1999 में शहीद हो गया। शहीद की मां शांति देवी और पिता शोभराम ने बताया कि बेटे की शहादत के बाद उसका स्मारक तो बन गया, लेकिन स्मारक तक जाने वाली सड़क का निर्माण अभीतक नहीं हुआ है। आरोप है कि लेखपाल पिछले 17 साल से हर साल शहीद के नाम पर पट्टा आवंटित करने के लिए भूमि की पैमाइश करता है, लेकिन अभीतक पट्टा आवंटित नहीं हुआ। शहादत के बाद पुष्पेंद्र के परिवार को केंद्र सरकार से पेट्रोल पंप मिला है।