संध्या परिवार का सहारा, समाज की मिसाल
शहर निवासी संध्या पाल विकलांग पिता और तीन छोटे भाई बहनों का सहारा बनी। प्राइवेट में ग्रेजुएशन करने वाली यह छात्रा पढ़ाई के साथ ही अरुणा नगर स्थित एक नर्सिंग होम में सहायिका के रूप में सेवाएं दे रही है। दुर्घटना का शिकार हुए पिता के साथ ही वह छोटे भाई बहिनों की शिक्षा की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं।
ये बदले हैं आप भी बदलो
शांती नगर निवासी स्नेह सिंह का कहना है कि बेटे बेटी में कोई फर्क नहीं है। सुपात्र बेटी के होते उन्हें बेटा न होने का अभाव कभी नहीं खला। पढ़ने में अव्वल रही बेटी आज भी परिवार का सम्मान बढ़ा रही है। प्रधानाध्यापिका के रूप में परिवार की इच्छाओं पर खरी उतर रही है।
सामाजिक संस्था वामा की अध्यक्ष डा. निरूपमा वर्मा बेटे बेटियों में कोई फर्क नहीं समझतीं। इनका कहना है कि यह केवल मानसिक कमजोरी है। हमें इससे ऊपर उठना चाहिए। हर बेटी भले ही ससुराल में रानी न बन सके लेकिन पिता के लिए वह हमेशा राजकुमारी होनी चाहिए।
सामाजिक कार्यकर्ता तारा कुशवाहा इसके लिए समाज से ज्यादा परिवार को जिम्मेदार मानती हैं। वे कहते हैं कि यदि बेटियों को समान अवसर मिलें तो कोई भी ऐसा कारण नहीं है कि बेटियां कुछ कम रहें। बेटियों के कीर्तिमान इसके प्रमाण हैं। इसकी पहल घर-परिवार से ही होनी चाहिए।
बेटियों के लिए संचालित विभिन्न अभियानों का असर समाज और लोगों की मानसिकता पर दिख रहा है। लिंग जांच और भ्रूण हत्याओं पर अंकुश लगा है। वहीं बेटियों के प्रति लोग संवेदनशील हुए हैं। उन्हें अधिकार मिल रहे हैं।
- डा. आरसी पांडेय, सीएमओ