स्वच्छता अभियान के तहत जिले में लोगों को जागरूक करने वाले विभाग ही अभियान को पलीता लगा रहे हैं। सरकारी कार्यालयों की छतों पर लगी प्लास्टिक की टंकियां कहीं टूटी पड़ी हैं तो किसी में ढक्कन नहीं हैं। अधिकांश में तो काई जम रही है, जिसे देखकर लगता है सालों से इनकी सफाई नहीं हुई है। इसमें भरा दूषित और गंदा पानी कार्यालयों में आने वाले फरियादी पी रहे हैं। हालांकि विभागीय लोग बंदरों के उत्पात को इसका कारण बता रहे हैं।
अमर उजाला की टीम ने जब गुरुवार को गर्मियों को देखते हुए सरकारी कार्यालयों की पानी की व्यवस्थाओं का जायजा लेने की कोशिश की तो यह स्थिति सामने आई।
सीएमओ कार्यालय पर लगी पानी की प्लास्टिक की टंकियां टूटी और ढक्कन रहित मिलीं। इन टंकियों में गंदगी की परत तक जमा हो गई है। इसके अलावा ढक्कनों के खुले होने से उनमें बंदर कूद-कूद कर भी नहाते हैं जिससे पानी दूषित हो रहा है। जल की बर्बादी को रोकने के लिए बनाए गए सरकारी ‘जल ही जीवन है’ के सरकारी स्लोगन का मजाक बना रहा है। विभागों की छतों पर लगी टंकियों की हालत का अंदाजा अधिकारियों को भी नहीं है। तीनों मुख्य कार्यालयों पर दिनभर में सैकड़ों कर्मचारियों के अलावा फरियादियों का भी आना जाना रहता है।
बंदरों के उत्पात से टूट रही पानी की टंकियां
सीएमओ कार्यालय पर लगी पानी की टंकी टूटने की वजह विभाग बंदरों के उत्पात को मानता है। विभाग की ओर से कई बार पानी की टंकी को ठीक करा दिया गया है। बार-बार इसके क्षतिग्रस्त होने की वजह से विभाग की ओर से पीने वाले पानी की टंकी को अब नीचे रखवा गया है।
बजट भी है बढ़ी समस्या
एक विभागीय कर्मचारी की मानें तो इन प्लास्टिक की टंकियों को ठीक कराने के लिए विभाग के पास बजट ही नहीं है। इसके चलते इनका स्थायी समाधान ही नहीं हो पा रहा है।
कई बार टंकी को ठीक करवाया गया है, लेकिन बंदर इसे खराब कर देते हैं। अबकी बजट आने पर इसका स्थायी समाधान करा दिया जाएगा।
- डा. आरसी पांडेय, सीएमओ