एटा। जलेसर के मतदाताओं का सियासी स्वाद बदलता है तो दशकों तक कायम रहता है। 2009 से पहले मतदाता सपा को तवज्जो देते रहे। जबकि परिसीमन के बाद 2009 से हुए चुनाव में उन्हें भाजपा रास आ गई।
1951 में पहले चुनाव में जहां एटा के नाम से तीन लोकसभा सीट थीं। परिसीमन के बाद एटा और जलेसर लोकसभा सीट कर दी गईं। 1962 तक जलेसर सीट पर लगातार सांसद चुने जाते रहे। जबकि 1967 और 1971 में जलेसर सीट को खत्म किया गया। 1977 के चुनाव में यह सीट फिर बहाल हो गई। इसके बाद लगातार 2004 तक यहां सांसद चुने गए। 2008 के परिसीमन में इस सीट को खत्म कर दिया गया।
2009 में जो चुनाव हुआ, उसमें जलेसर और अवागढ़ क्षेत्र को आगरा लोकसभा सीट में शामिल कर दिया गया।
2009 से पहले जलेसर लोकसभा सीट भाजपा के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रही। यहां महज एक बार 1991 में भाजपा के सुरेशानंद और 1996 में ओमपाल सिंह निडर ही पार्टी को जीत दिला सके। इसके बाद 1998 से 2004 तक तीन बार लगाताार सपा के प्रो. एसपी सिंह बघेल ने कब्जा किया। इसके बाद मतदाताओं का मन बदल गया। 2009 और 2014 में भाजपा के रामशंकर कठेरिया को जिताकर संसद भेजा। बाद में एसपी सिंह बघेल भी भाजपा में शामिल हो गए और 2019 में सांसद चुने गए। वर्तमान में इसी क्षेत्र से प्रतिनिधित्व करते हुए आगरा सीट के सांसद व केंद्र सरकार में मंत्री हैं।