देवरिया। मानसिक बीमारी के इलाज में सामाजिक प्रतिष्ठा और लोकलाज की बेड़ियां महिलाओं की राह रोक रही हैं। खासकर विवाहित महिलाओं के मामले में ससुराल पक्ष बीमारी को गंभीरता से लेने और मनोरोग विशेषज्ञ से परामर्श कराने में हिचकता है।
बदनामी के डर से समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण महिलाओं को लंबे समय तक मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है और बीमारी गंभीर होने का खतरा बढ़ जाता है।
महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग की अध्यक्ष डॉ. अंबु पांडेय के अनुसार, मेडिकल कॉलेज की मनोरोग ओपीडी में प्रतिदिन करीब 150 से 200 मरीज परामर्श के लिए आते हैं। इनमें महज 15 फीसदी विवाहित महिलिाएं होती हैं। इनमें करीब आधे सीधे विशेषज्ञ से सलाह लेते हैं, जबकि बाकी दूसरे चिकित्सकों के रेफरेंस पर आते हैं।
उन्होंने कहा कि मानसिक बीमारी भी अन्य बीमारियों की तरह है। इसे प्रतिष्ठा से जोड़ने के बजाय समय पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
डॉ. पांडेय ने बताया कि 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है। वे तनाव, बेचैनी और दूसरी समस्याओं के लिए बिना झिझक परामर्श ले रहे हैं। संवाद