जुनून के बल पर पाया इन बेटियों ने पाया मुकाम
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : विपरीत परिस्थितियां भी नहीं रोक पाईं राह
संवाद न्यूज एजेंसी
देवरिया। कुछ कर गुजरने का जज्बा और खुद पर विश्वास हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। मुश्किलों में सिर उठाकर आगे बढ़ने वाले कम ही होते हैं, लेकिन ये जुनून व जिद ही है कि जिसने सफर को आसान किया। सामने आई हर समस्या का सामना करते हुए बेटियों ने विभिन्न क्षेत्रों में जगह बनाई और आज इनकी कामयाबी की बदौलत जिले का नाम अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है। ये वे हैं जिन्होंने पुरुष प्रधान समाज को आईना दिखाने को आत्मसुरक्षा के गुर सीखे। विषम परिस्थिति में खुद ताकत बनीं और दूसरों का भी सहारा साबित हो रही हैं। ऐसी ही सशक्त होकर उभरती युवतियों की दास्तां....
पहले बनीं इंटरनेशनल खिलाड़ी, अब खुद दे रही आत्मरक्षा के टिप्स
स्पोर्ट्स स्टेडियम में ताइक्वांडो की खिलाड़ी प्रियंका वर्ष-2018 में थाईलैंड में आयोजित तिराक इंटरनेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। 11 नेशनल खेल चुकी हैं और एक में रजत भी जीता है। बैंक में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी श्रवण कुमार की पुत्री अब खुद ही विभिन्न स्कूल-कॉलेज में लड़कियों को आत्मरक्षा के गुर सिखा रही हैं। उनका चयन पटियाला में 10 से 13 मार्च तक आयोजित ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी के लिए गोरखपुर विवि टीम में भी हुआ है। तीन बहनों व दो भाइयों में चौथे नंबर की प्रियंका पहले फुटबॉल खेलती थीं, लेकिन जब ताइक्वांडो में हाथ आजमाया तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। इनकी बड़ी बहन एक शॉपिंग काम्पलेक्स में तथा मम्मी ब्यूटीशियन का काम करती हैं, इन्हीं से घर चलता है। अब ट्रेनिंग देने के चलते प्रियंका खुद का खर्च भी निकाल लेती हैं। ब्लैक डेन फर्स्ट की उपाधि ले चुकीं प्रियंका ने बताया कि देश के लिए वर्ल्ड चैंपियनशिप खेलना उनका सपना है, इसकी तैयारियां भी वह अपने कोच की देखरेख में कर रही हैं। लड़कियों को तो हर हाल में सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग लेनी चाहिए।
लड़कों के साथ की प्रैक्टिस, यूपी महिला क्रिकेट टीम में बनाई जगह
पिड़रा चौराहे के गायत्रीपुरम निवासी चंद्रप्रकाश चार संतानों में सबसे छोटी आकांक्षा मल्ल के घर में कोई खिलाड़ी नहीं हैं, लेकिन बचपन से ही क्रिकेट पसंद होने के चलते स्टेडियम आना शुरू किया। पहले एथलेटिक्स में कॅरियर बनाने की सोची, लेकिन लड़कों को क्रिकेट खेलते देख खुद भी उनके साथ खेलना शुरू कर दिया। घर वाले पहले तो सकुचाए, लेकिन उसके लगन को देखते हुए इसकी इजाजत दे दी। प्रतिभा की बदौलत आज वह यूपी अंडर-16 टीम की सदस्य है। इसी साल जनवरी में रायपुर में हुए इंटर जोनल बोर्ड ट्रॉफी में यूपीसीए की टीम की ओर से खेलते हुए टीम को उपविजेता बनाने में अहम योगदान दिया। राइट हैंड बैट्समैन एवं राइट हैंड मीडियम पेसर के रूप में इनकी गेंदबाजी के आगे स्टेडियम के अच्छे बल्लेबाज भी चकमा खा जाते हैं। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर को अपना आदर्श मानने वाली यह खिलाड़ी उन्हीं की तरह बनना चाहती है। घर के ऊपरी हिस्से को किराए पर देकर खर्च चलाने वाले परिवार की इस बेटी की प्रतिभा के कायल उनके कोच भी हैं। कोच पवन कुमार कहते हैं कि आकांक्षा बहुत ही टैलेंटेड है। सुविधाएं एवं सही मागदर्शन मिले तो एक दिन वह इंडिया टीम से खेलेगी।
खो-खो में खेला 17 नेशनल, खेलो इंडिया में हुआ चयन
स्टेडियम की ही खो-खो की खिलाड़ी खुशबू पांडेय साथी खिलाड़ियों में बटर के नाम से मशहूर हैं। जबरदस्त प्रतिभा के बल पर 17 नेशनल प्रतियोगिता में भाग ले चुकी हैं। पिछले वर्ष खेलो इंडिया में भी उनका चयन हुआ था और पूना में आयोजित सीनियर नेशनल में वह सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी चुनी गईं। यूपी टीम मेें रनर एवं चेजर के रूप में खेलने वाली बटर पिछले साल देवरिया में हुुई 17 वर्षीय स्कूलीय नेशनल में भी टीम को विजेता बनाने में अहम योगदान दे चुकी हैं। शहर के नाथनगर निवासी एवं तीन बहन एक भाई में सबसे बड़ी इस खिलाड़ी के हालात भी वही हैं जो सामान्य खिलाड़ी के घरों में होते हैं। उसकी कोच शालिनी शर्मा कहती हैं कि सीनियर इंडिया टीम से खेलने के सपने को पूरा करने के लिए वह हर दिन रात एक किए हुए हैं।
साइकिल होती उपलब्ध तो और बड़ी खिलाड़ी बनेगी रेखा
बगहा मठिया जूनियर विद्यालय में कक्षा आठ की छात्रा ने महाराष्ट्र में आयोजित 14 वर्षीय स्कूलीय खो-खो नेशनल में यूपी टीम से बेहतर प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसी गांव के रहने वाले एवं मजदूरी कर घर का खर्चा चलाने वाले संतू यादव की यह बेटी साइकिल न होने के बावजूद स्कूल समाप्त होने के बाद पैदल की प्रतिदिन स्टेडियम में खेल सीखने आती है। मां के निधन के बाद भी रेखा ने अपना धैर्य नहीं खोया तथा इसी खेल में ही करियर बनाने को लक्ष्य बनाया हुआ है। कई स्टेट व मंडलीय प्रतियोगिता में जिले का नाम रोशन कर वापस आने वाली इस खिलाड़ी के साथ फोटो खिचाने को तो विभाग से लेकर संघ के बहुतों लोग मिल जाते हैं, लेकिन इसे आगे बढ़ाने के लिए कम ही लोग आगे आते हैं। उनके प्रशिक्षक गनेश यादव कहते हैं कि साइकिल न रहने से उसे स्टेडियम समय से पहुंचने में दिक्कत होती हैं। कई बार तो वह नियमित रुप से जा भी नहीं पाती। अगर साइकिल हो जाती तो हमारा जिला खो-खो में एक और बड़ा खिलाड़ी देने में सक्षम होगा।
माता-पिता बनाना चाहते थे डॉक्टर, म्यूजिक में बना लिया खुद का बैंड ग्रुप
देवरिया। राघवनगर निवासी सतीश सिंह की बेटी निकिता शहर में संगीत के क्षेत्र में उभरता हुआ नाम हैं। तीन साल की उम्र से ही गाना शुरू किया और इसी उम्र में पहला इनाम भी जीता। परिवार वाले बिटिया को डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन उसका मन संगीत में ही ज्यादा लग रहा था। मम्मी के सपोर्ट किया और लखनऊ स्थित आइपा इंस्टीट्यूट से बाकायदा प्रशिक्षण दिलवाया। वहां से वापस आई तो शहर में वर्सटाइल बैंड के नाम से खुद का ग्रुप बना लिया। जो अब बाहर के शहरों के अलावा नेपाल तक अपनी प्रस्तुति दे चुका हैं। देवरिया गिटार टाउन के नाम से खुद का इंस्टीट्यूट खोल अब शहर के बच्चों व युवाओं को घर के ऊपरी मंजिल पर गिटार सिखाने वाली यह होनहार गिटार वाली दीदी के नाम से मशहूर हो चुकी हैं। बीएड कर रही निकिता सिंह ने बताया कि मम्मी ने उनके सपनों को उड़ान दी। गायकी के क्षेत्र में भले ही आज वह बहुत बड़ा नाम नहीं हैं, लेकिन एक न एक दिन वह इसे भी पूरा करेंगी।