उन्होंने रामजी सहाय को बापू की ओर से लिखे गए पत्रों का अवलोकन कराते हुए कहा कि महात्मा गांधी हर पत्र में उन्हें भाई रामजी सहाय लिख कर संबोधित करते थे। उन्होंने वर्धा और साबरमती आश्रम से सहाय जी को कई पत्र लिखे हैं जो आज भी सुरक्षित हैं। बाबू के आश्रम में रामजी सहाय का आना-जाना हुआ करता था।
गोरखपुर में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की जिम्मेदारी सहाय जी को दी गई थी। वह अपनी मकान पर लोगों का जुटान कर आजादी के आंदोलन के लिए सेना तैयार करते थे। इसके लिए उन्हें छह बार जेल की यात्रा करनी पड़ी। करीब तीन साल तक कठोर कारावास और जुर्माने की रकम चुका कर वह जेल से लौटे तो आंदोलन को चरामोत्कर्ष पर पहुंचाने में फिर जुट गए।
आजाद भारत में वह रुद्रपुर के पहले विधायक बने। उन्होंने दो बार यूपी के सदन में रुद्रपुर का प्रतिनिधित्व किया। जीवन की सारी जमापूंजी रामजी सहाय पीजी कॉलेज और दुग्धेश्वरनाथ इंटर कॉलेज में लगा दी। शिक्षा से अछूता रहे इस क्षेत्र में अपनी सारी चल-अचल संपत्ति दान कर शिक्षा की अलख जगाई।
रुद्रपुर, मछागर और महादेव छपरा की पुस्तैनी जमीन दान कर दी। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में रामजी सहाय जैसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को नमन करने के लिए लोग उनके पुस्तैनी मकान पर तिरंगा फहराने पहुंच रहे हैं।