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दिव्यांग प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी पाए शिक्षक भी जांच के दायरे में

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दिव्यांग प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी पाए शिक्षक भी जांच के दायरे में
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मुंहमांगे दाम पर बहरेपन का प्रमाण पत्र लेकर आरक्षित श्रेणी में भर्ती पा गए जालसाज
दर्जनों शिक्षक दिव्यांग प्रमाण पत्र के सहारे कर रहे नौकरी
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। शिक्षक भर्ती मामले में फर्जीवाड़ा सिर्फ शैक्षणिक प्रमाण पत्रों तक ही नहीं है। जालसाजों ने फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्रों का सहारा लेकर भी नौकरी हथिया ली है। बहरेपन के प्रमाण पत्र पर उन्हें दिव्यांग आरक्षण का लाभ मिला है। एसटीएफ की जांच में इन शिक्षकों की भी पोल खुलेगी। जांच तेज होने के बाद इनके माथे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रहीं हैं।
वर्ष 2010 के बाद अमूमन हर वर्ष हुई शिक्षक भर्ती में दिव्यांग श्रेणी का कोटा निर्धारित रहता है। इस कोटे में वही दावेदार हो सकते हैं, जिनके पास दिव्यांगता का प्रमाण पत्र हो। चहेतों को नियुक्ति दिलाने के लिए जालसाजों ने दिव्यांगता प्रमाण पत्र का सहारा लिया है। बहरेपन के आधार पर नियुक्त ज्यादातर शिक्षकों की यही स्थिति है। सूत्रों के मुताबिक 30-40 हजार रुपये में लखनऊ से फर्जी प्रमाण पत्र जारी कर उन्हें थमा दिया गया। इसी प्रमाण पत्र के आधार पर सामान्य श्रेणी के चयन प्रक्रिया से बाहर हुए जालसाजों को दिव्यांग आरक्षण श्रेणी में शामिल कर दिया गया। इसी तरह कमर के नीचे दिव्यांगता के लिए भी कई ने फर्जी प्रमाण पत्रों का सहारा लिया है। जांच अधिकारियों को बरगलाकर 10 से 20 प्रतिशत तक की दिव्यांगता का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया। जिले में ऐसे शिक्षकों की संख्या भी दर्जनों में है। एसटीएफ के जांच शुरू करने के बाद इनकी बेचैनी भी बढ़ गई है। खुद को सेफ करने के लिए वह जिम्मेदारों से सेटिंग में जुट गए हैं।
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पहले दूर ब्लॉक में तैनाती, फिर निलंबन, दूसरे ब्लॉक में बहाली
योजनाबद्ध ढंग से होती थी जालसाजों की तैनाती
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी पाने वाले शिक्षकों की तैनाती भी योजनाबद्ध ढंग से होती है। उन्हें पहले मुख्यालय से सुदूरवर्ती ब्लॉकों में तैनाती दी जाती है। नियुक्ति के कुछ माह बाद लापरवाही दर्शाते हुए उन्हें निलंबित करा दिया जाता है। फिर बहाली का आदेश देते हुए दूसरे छोर के ब्लॉकों से संबद्ध कर दिया जाता है। नए ब्लॉक में उन्हें सिर्फ बहाली आदेश के आधार पर ज्वाइनिंग करा दी जाती है। लिहाजा, इस ब्लॉक के अफसर-कर्मचारियों को उसके फर्जी होने की भनक भी नहीं लगती। वह पूरे इत्मीनान से नए स्थान पर नौकरी कर मोटी तनख्वाह उतारते रहते हैं। जिले में सलेमपुर, भागलपुर, लार, बनकटा, भाटपाररानी ब्लॉकों में ऐसी तैनाती खूब हुई है। इन ब्लॉकों में नियुक्ति तिथि के बाद से दस्तावेजों का सत्यापन किया जाए तो इसकी पोल खुलनी तय है।
अफसर-मातहत की खातिरदारी में हाजिर रहते थे जालसाज
जिले से बाहर आने-जाने पर पूरी सुविधाओं का रखते थे ख्याल
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी दिलाने वाले जालसाजों से पूछताछ में कई चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं हैं। जालसाज सिर्फ रुपये देकर नौकरी दिलाने तक ही नहीं सीमित थे, बल्कि साहब और उनके मातहतों की खातिरदारी में हर वक्त हाजिर रहते थे। उन्हें चाहे विभागीय कार्य से लखनऊ, इलाहाबाद या अन्यत्र जाना हो या फिर निजी कार्यक्रम में हिस्सा लेना हो। एक आवाज पर वह हाजिर होते थे। लग्जरी गाड़ी से लगायत होटल में रुकने, भोजन, मनोरंजन सहित अन्य सभी जरूरतों का खर्च वह खुद उठाते थे। विभागीय अफसरों और उनके मातहतों को इससे दोहरा लाभ होता है। अव्वल तो उन्हें बिना खर्च किए लग्जरी श्रेणी की सभी सुविधाएं मिल जाती थीं, दूसरा विभाग से टीए-डीए का खर्च भी वह हासिल कर लेते थे। यही कारण था कि ये जालसाज हर अफसर और संबंधित कर्मचारी के बहुत जल्द खास हो जाते थे। विभागीय कार्यालयों में उनकी तूती बोलती रही है। हर कोई उनके खेल से वाकिफ रहा है, मगर साहब का खास होने से मुंह खोलने से बचता रहा था। अब इनके शिकंजे में आने के बाद कारस्तानियां स्वत: सामने आ रही हैं।
ऊंची पहुंच के कारण दूसरे शिक्षकों पर धौंस जमाता था अश्वनी
वर्ष 2015 में भनवापुर ब्लॉक में हुई थी तैनाती, अक्सर रहता था गायब
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। एसटीएफ के हत्थे चढ़े अश्वनी श्रीवास्तव की नियुक्ति वर्ष 2015 में गणित-विज्ञान के 29 हजार शिक्षकों की भर्ती के वक्त हुई थी। सिद्धार्थनगर जिले के भनवापुर ब्लॉक में पूर्व माध्यमिक विद्यालय सरोथर कठौतिया में सहायक अध्यापक के रूप में 22 सितंबर 2015 को उसने ज्वाइनिंग की। यह भर्ती सिद्धार्थनगर के तत्कालीन बीएसए अजय कुमार सिंह की देख-रेख में हुई थी। अपनी कार्यप्रणाली और व्यवहार के कारण अक्सर विवादों में रहने वाले अजय कुमार सिंह की हनक के बावजूद अश्वनी अक्सर स्कूल से गायब रहता था। बताते हैं कि ऊंची पहुंच के चलते वह दूसरे शिक्षकों पर धौंस जमाता था। सीधे बीएसए स्तर के अफसरों से संपर्क के चलते अन्य शिक्षक भी टोकाटाकी नहीं करते थे। अध्यापन कार्य की बजाय वह अक्सर दूसरे कामों का हवाला देकर नदारद हो जाता था।
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आज फिर बीएसए कार्यालय आ सकती है एसटीएफ
देवरिया। दूसरे के नाम-पते पर नौकरी करने के संदेह में चिह्नित 44 शिक्षकों के नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों की तलाश में एसटीएफ सोमवार को फिर बीएसए कार्यालय आ सकती है। गुरुवार को टीम के पहुंचने पर बीएसए समेत दोनों पटल प्रभारियों के जिले से बाहर होने के चलते टीम को खाली हाथ लौटना पड़ा था। तब बताया गया था कि कोर्ट केस के सिलसिले में बाबू और बीएसए बाहर हैं। जिले में आते ही सारे रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की दलील दी गई थी। इस बीच एसटीएफ के हत्थे चढ़े अश्वनी और मुक्तिनाथ ने पूछताछ में दोनों बाबुओं की संलिप्तता भी जताई है। इसके बाद शनिवार को दोनों बिना किसी सूचना के कार्यालय से नदारद रहे। एसटीएफ को अब तक दस्तावेज नहीं मिले हैं। इसकी तलाश में सोमवार को टीम के आने की संभावना जताई जा रही है।
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