देवरिया। सोशल मीडिया में समाज सुधार और दूसरों को दायित्व निर्वहन की नसीहत देेने वाले लोगों को असल जिंदगी में अपना फर्ज याद नहीं रहता। अगर ऐसा होता तो शुक्रवार की रात मालवीय रोड पर हमले में बस मालिक की जान नहीं जाती। घटना के वक्त 100 से अधिक लोग मौके पर मौजूद रहे, मगर मारपीट और हमले का विरोध, बीचबचाव करने की बजाए हर कोई तमाशबीन ही बना रहा। यहां तक कि सड़क पर लहूलुहान पड़े अनूप को अस्पताल पहुंचाने के लिए भी पुलिस का इंतजार होता रहा। काफी देर तक पुलिस नहीं पहुंची तब अचानक से कुछ लोग सक्रिय हुए और अस्पताल ले गए, लेकिन तब तक अनूप की मौत हो चुकी थी।
घटनास्थल पर स्थित किराने की दुकान से ली गई सीसीटीवी के फुटेज पर गौर करें तो घटना रात करीब पौने नौ बजे की है। 18-20 की संख्या में मनबढ़ युवक हॉकी, डंडा, ईंट से बस मालिक अनूप राय पर हमला कर रहे थे। अनूप ने भी बचाव में कसर नहीं छोड़ी। वह कुछ देर तक अकेले ही हमलावरों से जूझता रहा, मगर संख्या में अधिक होने के कारण मनबढ़ भारी पड़े। नतीजा पीट-पीटकर उसे मरणासन्न कर दिया। इस बीच भीड़ में मौजूद किसी ने भी आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की। अनूप के लहूलुहान होकर सड़क पर गिरने और हमलावरों के जाने के बाद भी लोग उसे संभालने के लिए आगे नहीं आए। बाद में पहुंचे अन्य लोगों ने पुलिस को सूचना दी और जब इंतजार के बाद भी पुलिस नहीं पहुंची तो खुद अस्पताल ले गए, लेकिन तब तक अनूप की मौत हो चुकी थी। शनिवार को हर तरफ यही चर्चा थी कि अगर घटनास्थल पर जुटे लोगों ने तमाशबीन बनने की बजाए संवेदनशीलता दिखाते हुए मारपीट का विरोध या बीचबचाव किया होता तो शायद अनूप की जान नहीं जाती।
बीच शहर में भीड़ के बीच हुई हत्या समाज की संवेदनहीनता को प्रकट कर रही है। आज लोगों में आत्मकेंद्रिता बढ़ रही है, इसलिए लोग दूसरों की परवाह नहीं कर रहे। संवेदना शून्य समाज मुर्दा के समान है। बुराई का विरोध न करना, उसे पुरस्कृत करना है। ऐसी घटनाओं से आपराधिक तत्वों के ही हौसले बढ़ेंगे, जो कल दूसरों को निशाना बनाएंगे। लोगों को अपने दायित्वों के प्रति भी सचेत होने की जरूरत है।
- डॉ. नाजिश बानो, प्रवक्ता, मनोविज्ञान, संत विनोबा पीजी कॉलेज।