पुरुष की सोच में बदलाव बिना महिला सुरक्षा बेमानी
अमर उजाला अपराजिता 100-मिलियन स्माइल्स के तहत आयोजित हुआ संवाद
वर्तमान परिवेश में महिला सुरक्षा विषयक चर्चा में खुलकर बोलीं महिलाएं व युवतियां
संवाद न्यूज एजेंसी
देवरिया। समाज में दुष्कर्म, छेड़खानी सहित महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित अन्य घटनाएं तब तक नहीं रुकेंगी, जब तक कानून सख्त नहीं होगा। कमजोर कानून से कुछ लोगों में भय नहीं रह गया है। इसका फायदा अपराधी मानसिकता वाले उठाते हैं। कोई गलत बात हो जाने पर लड़कियां घबराएं नहीं, इसे परिवार के लोगों को बताएं। आवाज उठाएं तभी कुछ होगा। जब तक पुरुष अपने दोहरे चरित्र को नहीं बदलेंगे, सामाजिक बदलाव संभव नहीं हैं। लड़कों को भी घर से ही संस्कार के साथ ही बाहरी महिलाओं के साथ कैसे पेश आना है, इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए।
अमर उजाला फाउंडेशन के अपराजिता अभियान के तहत रविवार को राघवनगर स्थित देवरिया गिटार टाउन सभागार में आयोजित वर्तमान परिवेश में महिला सुरक्षा विषयक संगोष्ठी में मंच मिला तो युवतियां व महिलाएं खुलकर बोलीं। उनके विचार सुनकर अंदाजा हुआ कि छेड़खानी व दुष्कर्म जैसी बढ़ती घटनाओं को लेकर उनके अंदर आग सी लगी है, जिसमें दोषी लोगों को भस्म कर देने की बेचैनी छिपी है। शिक्षिका प्रिया गुप्ता ने बताया कि आधुनिक परिवेश में लड़कियों को आत्मसुरक्षा की ट्रेनिंग देना अति आवश्यक है। घर से ही अच्छे संस्कार देने की शुरुआत होनी चाहिए, अन्यथा बदलाव संभव नहीं है। साथ ही सरकार को पोर्न साइटों पर रोक लगानी चाहिए, बच्चे जब उत्तेजक चीजें देखेंगे तो दिमाग पर वह असर करेगा ही। लोक गायिका पूनम मणि ने कहा कि पहले स्कूल को विद्या का मंदिर माना जाता था, अब स्कूल केवल फीस वसूली के साधन बन गए हैं। अभिभावकों को भी यह ध्यान देना चाहिए कि बच्चों को क्या शिक्षा दी जा रही है। लड़कियों को भी सुनसान रास्ते पर जाने से पहले सौ बार सोचना चाहिए। बिंदास बनके निकलने से पहले दिल व दिमाग का भी प्रयोग करें। बैंकर प्रीति बरनवाल मानती हैं कि कानून व्यवस्था में सुधार हो जाए तो महिलाओं के साथ घट रहीं घटनाएं रुकेंगी। छोटी बच्चियों को भी हमारे समाज में नहीं छोड़ा जा रहा है, समझ में नहीं आ रहा कि हम कहां जा रहे हैं। ब्यूटीशियन रीना गुप्ता ने कहा कि मोबाइल भी ऐसे अपराधों को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। दिमाग परिपक्व होने के पहले बच्चों को यह न दें। छात्रा सांभवी रविंद्र पांडेय, आकांक्षा सिंह, जूही, आलिया त्रिपाठी ने बताया कि सजा सख्त होगी, तभी लोग डरेंगे, दुष्कर्म जैसे मामलों में सुनवाई की समय सीमा तय होनी चाहिए। बुजुर्ग बिंदु देवी ने कहा कि बेटे-बेटी में अंतर के भेद को मिटाना होगा। बेटियों के जन्म पर भी मिठाई बंटनी चाहिए। मोनिका बरनवाल ने कहा कि संकुचित व रुढ़िवादी सोच को तोड़ना होगा।
स्पीकअप
एक परिचर्चा जनप्रतिनिधियों के बीच भी होनी चाहिए। इसमें लड़कियां व महिलाएं भी पूछ सकें कि हमारी उनसे क्या अपेक्षाएं हैं। महिला सशक्तिकरण पर केवल बातें करने से कुछ नहीं होने वाला। इसकी हकीकत भी दिखनी चाहिए। पुरुषों को भी दोहरा चरित्र छोड़ना होगा।
-अर्चना सिंह, मॉडल।
निर्भया मामले में अभी तक दोषियों को फांसी नहीं हो पाई है। यह हमारी न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाता है। उनके माता-पिता आज भी न्याय की आस लिए कोर्ट का चक्कर लगा रहे हैं। सिस्टम में बदलाव जरूरी है। ऐसे मामलों में दोषियों की उम्र तो देखी ही नहीं जानी चाहिए।
-खुशी गौतम, छात्रा।
दुष्कर्म पीड़िता लड़की को समाज जीने नहीं देता, यहां तक कि उससे शादी करने को तैयार नहीं होता। आधुनिक समाज में भी बेटा-बेटी के प्रति अभिभावकों की सोच में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। जब तक सोच नहीं बदलेगी, कुछ नहीं हो सकता। लड़कों को घर से ही संस्कार दें।
-निकिता सिंह।
दुष्कर्म में फैसले के लिए छह माह तक की समय सीमा तय की जानी चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो हैदराबाद में घटी घटना के बाद पुलिस ने जो किया, उसकी हमेशा तारीफ ही होगी। चीन व अरब देशों में इस मामले में जैसे न्याय होता है, वैसी व्यवस्था हमारे यहां हों तो ऐसी घटनाएं रुकेंगी।
-मनीषा रौनियार।
सजा सख्त होगी तभी कोई भी लड़का या पुरुष छेड़खानी, दुष्कर्म जैसी घटनाओं को अंजाम देने के पहले सोचेगा। लोगों में भय नहीं रह गया है कानून के प्रति अन्यथा ऐसी चीजें समाज में सुनने को ही नहीं मिलती। कानून में संशोधनकर सख्त सजा का प्र्रावधान सबसे पहले जरूरी है।
-ज्योति यादव।
नवरात्र में कन्याओं की पूजा की जाती है, इसके बाद फिर पुरुषों की सोच उनके प्रति बदल जाती है। पूरे कपड़े पहनने वाली लड़कियों के साथ भी दुष्कर्म की घटनाएं हुईं हैं, पांच वर्ष की बालिका के साथ दुष्कर्म की वारदात सुनकर मन दहल जाता है। पता नहीं समाज कहां जा रहा है।
-शिखा त्रिपाठी।