देवरिया। बारिश के बाद जल जमाव से संक्रामक बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। टायफायड, वायरल फीवर और पीलिया के मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। जिला अस्पताल में टायफायड के लिए कारगर दवा उपलब्ध नहीं होने से मरीज सांसत में हैं। एंटीबायोटिक दवा सेप्ट्रान से टायफायड को काबू में करने का प्रयास किया जा रहा है। चिकित्सकों का मानना है कि इस दवा से रोग कंट्रोल में नहीं आ पा रहा है। यही नहीं अस्पताल में बुखार के मरीजों को दिया जाने वाला पैरासिटामॅाल टेबलेट भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में गंभीर हालत में टायफायड के मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की मजबूरी है।
जिला अस्पताल के केंद्रीय दवा भंडार गृह में कई महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। जीवनरक्षक दवाओं में डेकाड्रान, सेप्टियाजोन, एंपीसीलिन (सभी इंजेक्शन) टेबलेट के रूप में केवल सेप्ट्रान दवा ही मौजूद है। लेकिन पैरासिटामाल और मेट्रोजिल जैसी सामान्य दवाएं आम मरीजों को सुलभ नहीं हो पा रही हैं। जिला अस्पताल प्रशासन का कहना है कि कई एंटीबायोटिक दवाएं खत्म होने की स्थिति में है। कई महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक दवाओं का इंडेंट कंपनियों को भेजा गया लेकिन अभी तक दवाएं उपलब्ध नहीं है। डेकाड्रान इंजेक्शन को छोड़कर रेंटीडीन टेबलेट, ओआरएस का पैकेट, सिफेक्सीन, औफ्लाक्सासीन, एमॉक्सीलीन और सिफरोफ्लाक्सिन टेबलेट अस्पताल में उपलब्ध नहीं है। हालत यह है कि बारिश के मौसम में संक्रामक बीमारियों ने पांव पसारना शुरू कर दिया है।
बुखार के मरीजों को पैरासिटामाल टेबलेट देने की बजाय दर्द निवारक दवा दी जा रही है। टायफायड बुखार के मरीजों को सेप्ट्रान दवा दी जा रही है। चिकित्सक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अस्पताल में दवा मौजूद नहीं होगी तो दो ही रास्ते बचते हैं। एक बाहर से कारगर एंटीबायोटिक दवा लिखी जाय या फिर रेफर कर दिया जाय। इधर जिला अस्पताल में बुखार से पीड़ित मरीजों की संख्या में वृद्धि हुई है।
एक सप्ताह के भीतर टायफाइड, वायरल फीवर और पीलिया रोग से पीड़ित 400 मरीज जांच में सामने आये हैं। जिला अस्पताल के ओपीडी में बुखार के सामान्य मरीजाें को इंजेक्शन की बजाय टेबलेट लिखना ही डॉक्टर पसंद करते हैं। गंभीर हालत में ही इंजेक्शन दिया जाता है।
ये हैं बीमारी के लक्षण
प्राथमिक स्वास्थ्य केेंद्र भटनी के प्रभारी डॉ. एनपी सिंह ने बताया कि टायफायड बुखार करीब दो हफ्तों तक चलता है और इस बुखार का हर एक हफ्ता अपने खास लक्षण व जटिलता लिए जाना जाता है। शुरूआत में इस बीमारी में रोगी के आंतों में ही संक्रमण होता है। परंतु रोग बढ़ने पर रोगी का प्रत्येक अंग जीवाणु के संक्रमण की गिरफ्त में आ जाता है। यह संक्रमण सालमोनेला टायफी नामक जीवाणु से फैलता है। टायफायड दूषित पानी व दूषित चीजेें खाने से होता है। सामान्यत: आंत ज्वर टायफायड से पीड़ित व्यक्तियों को लगातार (103 से 104 डिग्री फैरेनहाइट) बुखार बना रहता है। उन्हें कमजोरी भी महसूस हो सकती है। पेट में दर्द, सिर दर्द अथवा भूख कम लग सकती है। इस बीमारी को जानने के लिए मल का नमूना या खून के नमूने की जांच की जाए।
ऐसे करें बचाव
l बासी भोजन न करें।
lसाबुन से हाथ धोकर खाना खाएं।
lनीबू पानी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करें।
lबाजार में बिकने वाले जंक फूड न खाएं।
l सब्जियों को बनाते समय उन्हें अच्छी तरह पकाएं।
l दिन में तेज धूप में ज्यादा देर तक चलने से परहेज करें।
l इसमें बचाव के लिए यह बहुत जरूरी है कि पानी को उबालकर पीएं।
l बाजार से खुले में बिकने वाले वस्तुओं व पदार्थों का सेवन न करें। खाना घर में बना खाएं।
l अगर फलों का सेवन करना हो तो उन्हें अच्छी तरह धोकर खाएं।
lबुखार होने पर खुद इसकी दवा न करें। बल्कि किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क कर इलाज कराएं।
lस्वास्थ्य लाभ होने के लिए पूरा विश्राम करें और संतुलित आहार लें।
एंटीबायोटिक दवा के रूप में केवल सेप्ट्रान टैबलेट मौजूद है। अन्य एंटीबायोटिक दवाओं की सप्लाई नहीं हो रही है।
- डॉ. केसी राय, प्रभारी सीएमएस जिला अस्पताल देवरिया।