जख्म पर मरहम लगाने नहीं आया कोई मसीहा
बदहाल हैं सरयू में विलीन हुए कुरह परसिया और कोलखास के लोग
सच्चिदानंद पांडेय
बरहज। सरयू के आगोश में अपना सब कुछ गंवा चुके कुरह परसिया और कोलखास गांव के विस्थापितों को आज भी मसीहा का इंतजार है। कोई ऐसा मसीहा, जो उनके दर्द को महसूस करे। वर्षों से विस्थापन की पीड़ा झेलते लोगों की दुश्वारी दूर करने का बीड़ा उठाए। अफसोस है कि चुनाव में भी नेताओं को उनकी सिसकियां नहीं सुनाई दे रहीं। उनकी तकलीफों की न तो कहीं चर्चा है और न ही कटाने रोकने के स्थायी समाधान कोई मुद्दा। ऐसे में अपने पुरखों की विरासत गंवा चुके दोनों गांवों के लोग ठगा महसूस कर रहे हैं।
करीब एक दशक पहले तक सरयू नदी तट पर करीब 2200 एकड़ में कुरह परसिया हरा-भरा गांव था। करीब 1200 लोग निवास करते थे। गांव से नदी करीब दो से तीन किमी दक्षिण बहती थी। वर्ष 2008 से 15 तक हुए भीषण कटान में कुरह परसिया और कोलखास गांव का अस्तित्व भौगोलिक नक्शे से ही समाप्त हो गया। गांव के कुछ लोग कपरवार में झुग्गी-झोपड़ी लगाकर रह रहे हैं तो कुछ अपने रिश्तेदारों के पास चले गए। उन्हें आज भी अपने पुरखों की जमीन को छोड़ने का दर्द साल रहा है। विस्थापित सुरेश मिश्र (70), शिवशंकर यादव (65), अच्छेलाल भारती (72) ने बताया कि वर्ष 1965 में नदी रूठ गई। पहले 20-25 घर उसमें समाए। इसके बाद से लगातार कटान बढ़ता गया। बताया कि 1967 के लोकसभा चुनाव में नेताओं ने गांव को कटान से बचाने का आश्वासन देते हुए दर्द पर झूठा मरहम लगाया था। इसके बाद तो कोई झांकने भी नहीं आया। सरकार ने जमीन दी, मगर छत भी नहीं दिया।
फाइलों में बंद है कटान रोकने का ड्रीम प्रोजेक्ट
कटान से अन्य गांवों को बचाने के लिए कपरवार संगम तट से भागलपुर तक नदी एरिया को डेंजर जोन घोषित कर दिया गया था। नदी किनारे बसे गांवों और रामजानकी मार्ग को बचाने के लिए विभाग ने 55 करोड़ का ड्रीम प्रोजेक्ट बनाया। मुख्य अभियंता समिति ने पूर्व में 1210 मीटर तटबंध, जिसे बाद में बढ़ाकर 2940 मीटर का प्रस्ताव लखनऊ भेजा था। इस पर 2016 में शासन ने मंजूरी दे दी थी। इसे अमलीजामा पहनाने के लिए पटना में 10 अप्रैल 2018 को तकनीकी सलाहकार समिति की बैठक हुई थी। इसके बाद से मामला ठप है।