सुधीर श्रीवास्तव
देवरिया। कुर्सी की सलामती के लिए राजनीतिक दोस्त बदलने में नेताओं को तनिक भी गुरेज नहीं है। जी हां, जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव भी सूबे में निजाम बदलने के बाद कुछ इसी राह पर हैं। सत्ताधारी दल के नेताओं से बढ़ी उनकी दोस्ती को देख विरोधी पशोपेश में हैं। विधानसभा चुनाव से पहले तक सत्ता बदलने का इंतजार कर रहे विरोधी गुट के जिला पंचायत सदस्य अंदर ही अंदर घेराबंदी की रणनीति बना रहे हैं। लेकिन डर इस बात का भी है कहीं उनका दांव उल्टा न पड़ जाए। यही वजह है कि विरोधी गुट फूंक-फूंक कर कदम रख रहा हैं।
सूबे में जब सपा की सरकार थी तो जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव की खूब चलती थी। हर छोटे-बड़े निर्णय में उनकी भूमिका अहम थी। जिला पंचायत में वही होता था, जो वह चाहते थे। विरोधी दल के सदस्य खून का घूंट पीकर रह जाते थे। सपा का सत्ता से सफाया होते ही विरोधी दल के सदस्य इस बात से खुुश थे कि अब तो तख्ता पलट हो जाएगा। लेकिन जिला पंचायत अध्यक्ष ने दल तो नहीं बदला, मगर दिल बदल लिया। सत्ताधारी दल के नेताओं के साथ दोस्ती की पींगे बढ़ाने लगे। यही वजह रही कि जब योगी सरकार ने निर्णय लिया कि कोई भी मंत्री लालबत्ती में नहीं चलेगा तो जिले में सबसे पहले लालबत्ती उतारने वालों में रामप्रवेश शामिल थे। जिला योजना की बैठक में विरोधी दल के नेता जिले की प्रभारी मंत्री अनुपमा जायसवाल को घेर रहे थे। उस दल के लीडर होने के बावजूद जिला पंचायत अध्यक्ष ने खामोशी की चादर ओढ़े रखना बेहतर समझा था। मजे की बात तो यह थी कि वह सत्ताधारी दल के एक सजातीय नेता की बगल की कुर्सी पर बैठकर तमाशा देख रहे थे। हालांकि बीच-बीच में रामप्रवेश के भाजपा में शामिल होने की अफवाह उड़ती रहती है। लेकिन जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं है। सत्ताधारी दल के नेताओं से दोस्ती पर उनका कहना है कि पहले से उनका इन लोगों के यहां आना-जाना है।