देवरिया। आज से पितृपक्ष शुरू हो रहा है। इस बार पितृपक्ष में षष्ठी तिथि का लोप है। पितृ दोष से मुक्ति के लिए इस पखवारे में पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। श्रद्धा से किया गया श्राद्ध ही कल्याणकारी होता है। श्राद्ध के लिए आठवें और नौवें मुहूर्त को प्रशस्त माना गया है।
ज्योतिषाचार्य विवेक उपाध्याय बताते हैं कि शास्त्रों में वर्णित पंच महायज्ञों में पितृ यज्ञ को विशेष स्थान प्राप्त है। इस संसार में श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याणप्रद उपाय नहीं है। शास्त्रों में इसे कुतप काल की संज्ञा दी गई है। मनु ने लिखा है कि ब्राह्मण के मुख से देवता हब्य को और पितर कब्य को ग्रहण करते हैं। श्राद्ध में ब्राह्मण को माध्यम माना जाना श्रेष्ठ बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि अंतरिक्ष में सूक्ष्म रूप में रहने वाले वे पितर श्राद्ध काल आ गया, यह सुनकर ही तृप्त हो जाते हैं। ये पितर मनोजव होते हैं अर्थात इन पितरों की गति मनु की गति की तरह होती है। ये स्मरण मात्र से ही श्राद्ध देेश में आ जाते हैं और श्राद्ध के निमित्त निमंत्रित ब्राह्मण के शरीर में सूक्ष्म रूप से तब तक स्थान बनाए रखते हैं, जब तक श्राद्धकर्ता उनको भोजन करा तृप्त न कर दे।
मरण तिथि को निश्चित करें श्राद्ध
स्कंद पुराण के अनुसार कहा गया है कि मरण तिथि पर श्राद्ध न करने वाले व्यक्ति के पितृगण उसे शाप देकर पितृ लोक लौट जाते हैं। उस व्यक्ति को दारुण कष्ट का भोग करना पड़ता है।
श्राद्ध में यह करने का है विधान
भविष्य पुराण के अनुसार 12 प्रकार के श्राद्ध नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, सपिंडन, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धर्श, कर्मांग, दैविक, यात्रार्थ और पुष्टयर्थ का वर्णन है। पितृ पक्ष में विशेष तिथि के दिन पार्वण श्राद्ध करने का विधान बताया गया है।
श्राद्ध के अंग
श्राद्ध के चार अंग तर्पण, भोजन एवं पिंडदान, वस्त्रदान और दक्षिणा दान हैं। तर्पण में पितरों को दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने के लिए दिया जाता है। इसे श्राद्ध पक्ष में नित्य करने का विधान है।
संतुष्ट पितर देते हैं आशीर्वाद
गरूण पुराण के अनुसार पितृ पूजन से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों को दीर्घायु, पुत्र, यश, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, सुख, धन-धन्यादि सब कुछ प्रदान करते हैं।