सच्चिदा नंद पांडेय
बरहज। घाघरा में आए उफान के कारण कोलखास और ज्ञानकोल के विस्थापितों के घर पानी में डूब गए थे। करीब एक माह से विस्थापित रामजानकी मार्ग पर सड़क के किनारे टेंट डालकर जीवन यापन कर रहे हैं। बाढ़ पीड़ित व्यथा बताते वक्त रो पड़े। महिलाओं का कहना है कि नदी की झींगा-मछली और भात खाकर घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। जबकि बाढ़ का पानी हट जाने के बाद भी घरों में कीचड़ है। वहीं मूसलाधार बारिश से बाढ़ पीड़ितों का जीवन नरक बन गया है।
नदी में दूसरी बार आए सैलाब से जलस्तर खतरे के निशान 66.50 से बढ़कर 67.95 मीटर पर पहुंच गया था। बाढ़ के पानी के दबाव से परसियां-नुरुलाह मुख्य बंधा टूट गया था। लेकिन प्रशासन ग्रामीणों की मदद से 24 घंटे के अंदर बंधे की मरम्मत करा लिया था। आए बाढ़ से दियारा क्षेत्र के 25 टोलों सहित नगर के पटेल नगर, जयनगर, गौरा आदि आधा दर्जन गांव पानी से घिर गए थे। बाढ़ की विभिषिका के आगे विस्थापित घरों के लोग सड़क के किनारे टेंट में रह रहे हैं। टेंट के बाहर चारपाई पर झींगा मछली सूखा रही फूलमती पत्नी दुखी साहनी, सुमन देवी, राजेश, ब्रह्मा, गीता देवी और जगमोहन आदि का कहना है कि करीब चार दिनों से जलस्तर में आई कमी से बाढ़ का पानी घरों से हट रहा है। लेकिन उसमें कीचड़ जैसी समस्या बनी है। लोग मछली-भात खाकर किसी तरह गुजर-बसर करने के साथ सही सलामत घर पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं। देखा जाए तो दो दिनों से बाढ़ के बाद हो रही मूसलाधार बारिश ने लोगों का जीवन नारकीय बना दिया है।