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किसानों की कृषि भूमि निगल रही है घाघरा

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बरहज के बेलडांड़-कुरह परसियां के बीच कटान करती घाघरा - फोटो : अमर उजाला
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बरहज। घाघरा नदी के जलस्तर में आई कमी बावजूद कटान थमने का नाम नहीं ले रहा है। घाघरा किसानों की कृषि भूमि को निरंतर निगल रही है। इससे किसानों और समीपवर्ती गांवों के लोग परेशान हैं।
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बेलडांड़-कुरह परसियां के बीच नदी तेजी से कटान कर रही है। हो रहे कटान से नंदलाल पांडेय, नित्यानंद, सुरेश मिश्र, बबलू, रमेश, पप्पू, राजेश सिंह, आदि का खेत घाघरा में समा गया है। जबकि अन्य तटवर्ती क्षेत्र के कृषि भूमि निशाने पर हैं। लोगों का कहना है कि इस मौसम में हो रही कटान अशुभ संकेत है। यही आलम रहा तो एक-एक कर किसानों के खेत नदी में समा जाएंगे। जबकि बरसात के बाद से हो रही कटान में करीब 100 एकड़ कृषि भूमि नदी में कट चुकी है। नदी का रुख दक्षिण के बजाय उत्तर की ओर हो गया है। जिससे बेलडांड़, कुवाइच टोला, नौका टोला और रामजानकी मार्ग का अस्तित्व खतरे में है। इस संबंध में उपजिलाधिकारी अरुण सिंह ने बताया कि हो रही कटान चिंता का विषय है। किसानों से शिकायती पत्र मिलने पर शासन से प्रयास कराया जाएगा।

नदी में समा चुका है कुरह परसियां और कोलखास
क्षेत्र के सरयू तट पर बसा कुरह परसियां और कोलखास गांव 2015 की बाढ़ में नदी में समा गया। इससे अस्तित्व भौगोलिक नक्शे से समाप्त हो गया। जबकि प्रशासन हाथ पर हाथ धरे कटान का मंजर देखता रहा। कुरह परसियां गांव में करीब 500 घरों में 1600 लोग निवास करते थे। जहां ब्राह्मण, यादव, क्षत्रिय और अन्य जाति के लोग रहते थे। विस्थापितों का कहना है कि छह अगस्त 2008 को नदी कटान करने लगी। जिससे गांवों के एक-एक घर नदी में समाते चले गए। 2015 तक समूचा गांव के अलावा गोरखपुर जिले का कोलखास गांव का अस्तित्व खत्म हो गया। कटान की रोकथाम आदि के लिए प्रमुख सचिव भी दौरा कर चुके हैं। लेकिन लोगों की मानें तो ढाक के तीन पात हैं। कटान की रोकथाम के लिए समुचित व्यवस्था न होने से नदी रामजानकी मार्ग की ओर बढ़ रही है, जिससे लोगों में दहशत है।
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