देवरिया। जनता दल के पूर्व विधायक नंदकिशोर सिंह का मंगलवार को निधन हो गया। वह 74 वर्ष के थे। सोमवार सुबह सीने में दर्द होने के बाद उन्हें गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। मंगलवार की सुबह आठ बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ देकर उनका अंतिम संस्कार पैतृक गांव सहवा इंटर कॉलेज में किया गया।
देसही देवरिया के सहवा गांव के एक संभ्रांत परिवार में नंदकिशोर सिंह का जन्म 23 सितंबर 1942 को हुआ था। वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद कृषक इंटर कॉलेज बलटिकरा में सहायक अध्यापक के रूप में नौकरी शुरू की। पिछले कुछ महीनों से उन्हें हॉर्ट की बीमारी थी। एसजीपीजीआई में इलाज चल रहा था। पूर्व विधायक के पांच संतान जितेंद्र सिंह, अनिल सिंह, गीता, पुष्पा और किरण हैं।
अंतिम संस्कार में टूटी दलीय सीमाएं
पूर्व विधायक नंदकिशोर सिंह के निधन की खबर मिलते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। अंतिम संस्कार में दलीय सीमाएं टूट गई। उन्हें आखिरी विदाई देने वालों का हुजूम उमड़ पड़ा। सदर विधायक जन्मेजय सिंह, पूर्व मंत्री शाकिर अली, पूर्व विधायक सुबास चंद श्रीवास्तव, देसही देवरिया के ब्लॉक प्रमुख मुकेश यादव, पारसनाथ सिंह, ध्रुवदेव, संजय सिंह, प्रेमचंद्र श्रीवास्तव, पूर्व विधायक वीरेंद्र चतुर्वेदी, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष आनंद सिंह, गिरीश चंद तिवारी, भरतलाल गुप्त, सोनू मल्ल, राजू सिंह आदि प्रमुख रहे। बड़े बेटे जितेंद्र सिंह ने मुखाग्नि दी।
आदर्शों से नहीं किया समझौता
अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखने के बाद भी उन्होंने आदर्शों और उसूलों से कभी कोई समझौता नहीं किया। उनकी बात करते हुए लोगों की आंखें भीग जा रही थीं। संघर्षो और ईमानदारी के बल पर उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई।
दिया गया गार्ड ऑफ ऑनर
लोकतंत्र सेनानी पूर्व विधायक को मजिस्ट्रेट रामाश्रय दुबे ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। तिरंगे में लपेटकर आखिरी विदाई दी गई। प्रभारी थानेदार श्याम बिहारी ने जवानों का नेतृत्व किया।
राजनीतिक जीवन
लोहिया के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत सोशलिस्ट पार्टी से की। वह 1980 से 85 तक गौरीबाजार विधानसभा क्षेत्र से जनता दल से विधायक रहे। इमरजेंसी के दौरान कई बार जेल गए और लोहिया के आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 1977 में जनता दल बनने के बाद टिकट नहीं मिलने पर निर्दल चुनाव लड़े। मगर बहुत कम अंतर से वीरेंद्र चतुर्वेदी से हार गए। 1980 में जनता दल के विभाजन के बाद लोकदल से चुनाव लड़कर जीत हासिल कर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 1996 में जनता दल से लोकसभा लड़े मगर श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी से हार गए। जीवन की कठिनाइयों से कभी हार नहीं मानी। उन्होंने सभी लोगों का सम्मान किया और जरूरतमंदों की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।