युवाओं का पलायन रोकने को नहीं बनी ठोस योजना
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मुंबई, पंजाब, गुजरात सहित तमाम क्षेत्रों में जाकर रोजगार के लिए जूझ रहे हैं युवा
घर आने के लिए बेकरार युवाओं के पांव में बेरोजगारी बनी है जंजीर
औद्योगिक विकास की योजनाएं राजनीतिक उपेक्षा से हुईं धड़ाम
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। पैकौली निवासी 20 वर्षीय निरंजन चेन्नई में रहकर एक फैक्ट्री में वेल्डर का काम करता है। कड़ी मेहनत के बाद उसे महीने में 15 हजार रुपये मिलते हैं। उसके साथ यहीं के सुरेश राजभर, वीरेंद्र, अजय सहित 7-8 अन्य युवक भी वहां काम करते हैं। यह युवा घर लौटना चाहते हैं, मगर आजीविका की चिंता उनके कदम रोक लेती है। देसही के रियाज मुंबई में रहकर 14 हजार महीना कमा रहे हैं। इसमें 7-8 हजार रुपये रहने-खाने में ही खर्च हो जाते हैं। बुनाई का काम करने जितेंद्र पंजाब के लुधियाना में हैं। छह माह के सीजन में उनकी ठीक-ठाक कमाई हो जाती है, लेकिन घर की याद हमेशा सताती रहती है।
यह चंद उदाहरण तो बस नजीर हैं। जिले के हजारों युवा ऐसे हैं, जो रोजगार की खातिर दूसरे शहरों में भटक रहे हैं। भरण-पोषण की चिंता ने उन्हें घर-परिवार से दूर कर दिया है। वर्षों से चुनावी वादों और घोषणाओं के केंद्र में होने के बावजूद इनकी मूल समस्या रोजगार का समाधान नहीं हो पाया है। संसाधनों के अभाव में दम तोड़ते उद्योगों के बीच खुद को जिंदा रखने के लिए युवाओं को अपने हुनर दूसरे शहरों में जाकर बेचना पड़ रहा है। वर्ष 1946 में जिला बने देवरिया ने आजादी के बाद की हर सरकार को देखा है। अमूमन हर चुनाव में उद्योगों की स्थापना कर रोजगार सृजन का वादा होता रहा, मगर सात दशक के बाद भी औद्योगिक विकास के नाम पर कोई खास तरक्की नहीं हुई है। चीनी मिलों के बंद होने के बाद बेरोजगारी का ग्राफ तेजी से बढ़ा है और उतनी ही तेजी से युवाओं का पलायन भी। वर्तमान में जिले के करीब 60 हजार से भी अधिक युवा गैर प्रांतों या देशों में रहकर आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जिला सेवायोजन कार्यालय के आंकड़ों पर गौर करें तो 28946 युवा यहां बेरोजगार के रुप में पंजीकृत हैं। यह संख्या सिर्फ हाईस्कूल-इंटर पास बेरोजगारों का है। इससे इतर भी हजारों युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।
औद्योगिक क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं नहीं
जिले में कुल आठ औद्योगिक क्षेत्र व आस्थान स्थापित हैं। यूपी राज्य औद्योगिक विकास निगम ने उसरा बाजार में औद्योगिक क्षेत्र बसाया है। उद्योगों के नाम पर यहां बमुश्किल 7-8 इकाइयां हैं। इसमें फ्लोर मिल, सोयाबड़ी, प्लास्टिक प्रोडक्ट, अटैची निर्माण से जुड़े काम होते हैं। औद्योगिक क्षेत्र में सड़क, नाली, बिजली जैसी मूलभुत सुविधाओं का अभाव है। कई वर्षों से उद्योग बंधु की बैठक में इस पर चर्चा होती है, मगर बैठक खत्म होते ही उसे भुला दिया जाता है। जिला उद्योग व उद्यम प्रोत्साहन केंद्र के अंतर्गत के मेहड़ा पुरवा और सलेमपुर में औद्योगिक आस्थान, जबकि गौरीबाजार, पथरदेवा, बरहज, भाटपाररानी, रुद्रपुर में लघु औद्योगिक आस्थान हैं। रुद्रपुर और बरहज में आरक्षित भूखंड को कांशीराम शहरी आवास योजना के लिए चयनित कर लिया गया। मेहड़ा पुरवा और सलेमपुर में 20-20 लघु औद्योगिक इकाइयां संचालित हैं। वहीं पथरदेवा, गौरीबाजार में 10-12 इकाइयां क्रियाशील हैं। इन इकाइयों में 8-10 बमुश्किल 8-10 लोग जुड़े हुए हैं, जिनसे मजदूरी का काम लिया जा रहा है।
एक साल में महज 604 को दिलाया रोजगार
पढ़े-लिखे बेरोजगारों को रोजगार दिलाने में मदद करने वाले सेवायोजन कार्यालय की उपलब्धि भी अच्छी नहीं है। पिछले एक साल में इस कार्यालय से महज 604 युवाओं को रोजगार दिलाया जा सका है। इसमें दो महिलाएं हैं। वर्ष 15-16 में 129, वर्ष 16-17 में 162, वर्ष 17-18 में 227 युवाओं को रोजगार दिया गया है।
परवान नहीं चढ़ सकीं योजना:
* एनएसआईसी का खुला केंद्र
युवाओं को हुनरमंद बनाने के लिए सांसद कलराज मिश्र ने केंद्र में लघु एवं सूक्ष्म उद्योग मंत्री रहते हुए जिले में राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (एनएसआईसी) का केंद्र स्थापित कराया था। इसमें युवाओं को स्वरोजगार स्थापित करने के लिए प्रशिक्षण देने की व्यवस्था है। देश के चुनिंदा शहरों में स्थापित यह केंद्र पिछले दो साल से जिले में संचालित है, मगर व्यापक प्रचार-प्रसार के अभाव में युवा इससे अनभिज्ञ हैं। लिहाजा उन्हें इसका लाभ नहीं मिल पा रहा। केंद्र में लगी कीमती मशीनें धूल फांक रही हैं।
* वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट
इस योजना के तहत जिले में सजावटी सामान वाले उत्पादों का चयन हुआ है। प्रदेश सरकार की तमाम कवायदों के बावजूद बीते सत्र में सिर्फ 11 ऋण पत्र स्वीकृत हो सके। इससे करीब 44 लोग जुड़े हैं। योजना के तहत तैयार होने वाले माल की बिक्री के लिए अनुकूल बाजार नहीं मिलने से इससे जुड़े लोग भी मायूसी से जूझ रहे हैं। सस्ते चीनी प्रोडक्ट के आगे देसी सामान की पूछ कम है।
* युवा स्वरोजगार योजना
उद्योग, रोजगार या सेवा क्षेत्र से जुड़ने के लिए 25 लाख रुपये तक ऋण की व्यवस्था है, मगर बैंकों की उदासीनता से आवेदकों को ऋण स्वीकृत कराने में ही नाकों चने चबाने पड़ते हैं। आवेदनों को मंजूरी देने की बजाए बैंक आपत्ति जताते हुए लौटा रहे हैं। इससे स्वरोजगार के इच्छुक युवाओं को निराशा मिल रही है।