फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ठंड में ठिठुर रहे तीन मासूम व महिला को अब तक नहीं मिली छत

Sun, 11 Jan 2015 01:05 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला चित्रकूट।
विज्ञापन
विज्ञापन
तीन साल से तीन बच्चों के साथ कड़ाके की ठंड में पन्नी तानकर रहने को विवश है। पति परदेस कमाने गया है. घर ढहा तो बनाने को पैसा नहीं है लेकिन जिले के आला अधिकारियों को इसकी कोई चिंता नहीं है। कोई भी सरकारी योजना उसके लिए नहीं...। शायद पात्रता के ‘मानदंडों’ को यह पूरा नहीं करती है।
विज्ञापन


ये देखकर प्रदेश सरकार की आवास योजनाओं की असलियत खुल जाती है। वैसे बड़े-बड़े होर्डिंग, टीवी चैनल और रेडियो पर आवास योजनाओं का प्रचार-प्रसार कराकर प्रदेश के लोगों को अच्छे दिन आएंगे के सपने दिखाए जा रहे हैं। लेकिन इस परिवार की हालत खुद ब खुद प्रदेश सरकार की मार्केटिंग की पोल खोलरही है।  

मऊ तहसील मुख्यालय में यमुना रोड के पास बस्ती के अंदर घुसते ही एक पन्नी का तंबू ध्यान खींचता है। इस ठंड में यहां  एक महिला अपने तीन बच्चों के साथ कैसे रह रही है, यह तो वही बता सकती है। इस कड़ाके की ठंड में लोग घरों में हीटर, मोटी रजाई और गरम पहनने के बाद भी घर से नहीं निकल रहे हैं।
विज्ञापन


लेकिन इस परिवार के लिए जाड़ा रोकने का एकमात्र यही पन्नी लगा तंबू ही है।  नाम रेखा निषाद, उम्र तीस साल। पति राममिलन निषाद, मजदूरी कर किसी तरह परिवार का भरण-पोषण करता है। रेखा यहां छह साल के शिवपूजन, दो साल के रोहित और एक साल के मोहित के साथ रहती है।

रेखा ने बताया कि तीन साल पहले उसका कच्चा घर ढह गया था। तब से अब तक दंपति मिलकर मजदूरी करने के बाद चार दीवारें नहीं बना पाए हैं।

यहां काम न मिलने पर राममिलन बाहर ईंटभट्ठे में काम करने चला गया। उसने बताया कि उसके पास न तो बीपीेएल, न अंत्योदय और न किसी अन्य सुविधा का प्रमाणपत्र है। हर जगह गुहार लगाई लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।
 
प्रधान जमुना केशरवानी ने कहा कि  इसके लिए इंदिरा, महामाया आवासों के लिए तीन तीन बार आवास का प्रस्ताव भेजा पर पता नहीं क्यों, इसे फायदा नहीं मिला। फिर से प्रस्ताव भेजा जाएगा। अन्य सुविधाएं दिलाने की कोशिश होगी।
विज्ञापन


विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें