सीतापुर आयुर्वेदिक अस्पताल खुद ही ‘बीमार’ है। 25 बेड के अस्पताल में दवाएं बाहर से लेनी पड़ती हैं। फटी और गंदी चादरें, टूटे पलंग मरीजों को और बीमार करने के लिए काफी है।
बिजली की दुरुस्त व्यवस्था न होने पर रात में तीमारदार मोमबत्ती के सहारे रहते हैं।
सीतापुर में पुराने बस स्टैंड के पास स्थित सरकारी आयुर्वेदिक अस्पताल का पुरसाहाल नहीं। अस्पताल में दो चिकित्सक, एक फार्मेसिस्ट, एक वार्ड ब्वाय, एक वार्ड आया, स्वीपर और वाशमैन हैं।
ऐसा नहीं कि यहां मरीजों का टोटा हो, रोजाना काफी मरीज आते हैं। यह बात अस्पताल के बोर्ड में लिखे आंकड़े भी साबित करते हैं।
जिसके अनुसार, अप्रैल में 1116, मई में 1566, जून में 1591, जुलाई में 1501, अगस्त में 1504 और सितंबर माह में 1284 मरीजों का यहां इलाज किया गया।
चिकित्सालय का सड़क पर लगने वाला संकेतक बोर्ड टूट गया तो उसे कबाड़ में फेंक दिया गया। तीमारदारों ने बताया कि दवाएं भी बाहर से मंगानी पड़ती हैं।
चादरें और तकिया इतनी गंदी है कि लेटा नहीं जा सकता। घर से लाई चादरों को बेड पर बिछाते है। टूटे पलंग को कभी ईंटों की मदद से टिकाना पड़ता है।