फोटो-12- पर्यावरणविद डा. जीडी अग्रवाल- फाइल फोटो
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चित्रकूट। महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. गुरुदास अग्रवाल (जीडी अग्रवाल) ऐसे शिक्षक थे जो किसी भी छात्र को सीख देने से पहले खुद उस पर अमल करते थे। कम से कम बिजली और मशीनरी का उपयोग उनकी आदत में शामिल था। उनके साथ काम करने वाले लोग उन्हें दधीचि के नाम से पुकारते थे।
देह त्यागने से पहले डॉ. जीडी अग्रवाल स्वामी सानंद महाराज के नाम से जाने जाते थे। उन्होंने जीवन भर गुरु और शिष्य दोनों की भूमिका बहुत ही सरलता और प्रतिष्ठा के साथ निभाई। गुरु के रूप में उन्होंने छात्रों को हमेशा मेहनत से कार्य करने की सीख दी। अपने गुरु के आदेश के मुताबिक डॉ. अग्रवाल ने खुद को उत्तराखंड में गंगा की रक्षा के लिए बलिदान कर दिया।
डॉ. अग्रवाल प्रकृति का अनुसरण करते थे, यही वजह है कि वह सिद्धांतों के साथ पंचतत्व को लेकर समझौता नहीं करते थे। घड़ी न पहनने के बावजूद समय के बहुत पाबंद थे। वह छात्रों को देश के जिम्मेदार नागरिक की तरह देखना पसंद करते थे, इसलिए उनके छात्र वैचारिक रूप से स्वतंत्र व तार्किक हैं। चित्रकूट की जीवन रेखा मंदाकिनी नदी पर पहली पीएचडी उनके मार्गदर्शन में डॉ. कनन ने की थी। उन्होंने ग्रामोदय विश्वविद्यालय में मंदिर का निर्माण भी कराया था।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डा. अग्रवाल आईआईटी कानपुर के सिविल इंजीनियरिंग और पर्यावरण विभाग में प्राध्यापक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव और राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के सलाहकार भी रहे थे। भारत रत्न नानाजी देशमुख के बुलावे पर उन्होंने महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अवैतनिक सेवाएं दीं। विवि में पर्यावरण विज्ञान विभाग उन्होंने ही स्थापित किया था।