रैपुरा गांव में हाइवे किनारे बनी रावण की मूर्ति।
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अहंकारी रावण को धर्मनगरी के रैपुरा गांव में पूजा जाता है। यहां स्थाई रूप से रावण की मूर्ति भी स्थापित है। ग्रामीणों का मानना है कि यह क्षेत्र के लिए अपशगुन नहीं बल्कि वरदान से कम नहीं है। इस मूर्ति की स्थापना कब हुई थी, इसकी सही जानकारी ग्रामीणों को नहीं है। ग्रामीण इतना जरूर बताते हैं कि यह दशकों पुरानी है। इस गांव के एक दर्जन से अधिक लोग आइएएस व पीसीएस हैं।
देश के अधिकांश हिस्सों में मंगलवार को रावण के पुतले को फूंककर दशहरा पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। धर्मनगरी में भी जहां-जहां रामलीला का मंचन चल रहा है। वहां रावण के बडे़-बड़े पुतले तैयार करा लिए गए हैं लेकिन इसी क्षेत्र में एक ऐसा गांव रैपुरा है, जो इससे दूर है। हाइवे किनारे ही स्थाई रूप से बनी रावण की मूर्ति का हर साल ग्रामीण रंगरोगन कराकर पूजन करते हैं। इसे कतई अपशगुन नहीं माना जाता। सोमवार को ग्रामीणों ने पूरे उत्साह के साथ मूर्ति का रंगरोगन कराकर साफ सफाई कराई।
गांव के महेंद्र प्रसाद सिंह और पूर्व प्रधान जगदीश पटेल ने बताया कि गांव के बच्चे सुबह स्कूल जाते समय कई बार तो वहीं खडे़े होकर इसेे निहारते हैं और फिर घर आकर अभिभावकों से रामायण के पाठ के हिसाब से सवाल जवाब भी करते हैं। बताया कि गांव में शिक्षा का स्तर काफी बेहतर है।
यहां के सीपी सिंह और अभिजीत सिंह आईएएस अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। तेज स्वरूप सिंह, राजस्वरूप सिंह, राम किशोर शुक्ला और यादवेंद्र शुक्ला पीसीएस अधिकारी हैं। इसके अलावा प्रहलाद सिंह (सीडीओ), प्रदीप पांडेय (बीडीओ), नाथूराम सिंह (रेंजर), डा. लक्ष्मी शिवा, डा. अखिलेश सिंह, डा. बलवीर सिंह, डा. अश्वनी कुमार, डा. संदीप कुमार, डा. आशा सिंह, डा. अनुतोष सिंह स्वास्थ्य विभाग के उच्च पदों पर कार्यरत हैं। ये लोग साल में एकाध बार जरूर गांव आते हैं। सभी की प्राथमिक शिक्षा इसी गांव में ही हुई है।