225 रुपये मानदेय और सुरक्षा से लेकर डाक पहुंचाने तक का काम। ठंड में फटी पुरानी वर्दी में कर्तव्य निभाने से पीछे नहीं हटते। जिले में होमगार्ड्स का कुछ ऐसा ही हाल है।
हालांकि अधिकारी इस बात का दावा करते हैं कि डीजी होमगार्ड्स जवानों की सुविधाओं के लिए प्रयासरत हैं। जल्द ही राजस्थान और मप्र के होमगार्ड्स की तरह इनकी भी स्थिति बढ़िया होगी। लेकिन कब तक इसका उत्तर किसी के पास नहीं हैं।
पूरे प्रदेश में लगभग एक लाख पचीस हजार होमगार्ड्स हैं। जिले में होमगार्ड्स की छह कंपनियां हैं। इनमें करीब साढ़े पांच सौ जवान हैं, जिनमें से 14 महिला कर्मचारी हैं। होमगार्डों की स्थिति बदतर होती जा रही है।
भीषण ठंड में पुरानी वर्दी, फटी-मुड़ी टोपी और अन्य संसाधनों के अभाव में भी ये पूरी ड्यूटी कर रहे हैं। कई जिलों में तो वर्दी का कपड़ा और सर्दी से बचाव के लिए जर्सी या जैकेट दी जा चुकी है।
लेकिन यहां के होमगार्ड ठिठुरते हुए कर्तव्य निभा रहे हैं। उन्हें अभी तक पिछले माह का मानदेय भी नहीं मिला। होमगार्ड बताते हैं कि अगर खेती का सहारा न हो तो भूखे मरने की नौबत आ जाए।
भीषण मेहनत के बाद भी उन्हें महज 225 रुपये मानदेय ही मिलता है। होमगार्डों ने पांच साल से वर्दी का कपड़ा न मिलने की बात कही।
समिति बन रही
जिला कमांडेंट श्याम सरोज सिंह ने बताया कि जिले में आपदा सुरक्षा समिति बनाई जा रही है, जिनमें होमगार्ड्स को पर्याप्त काम मिलेगा। इनको बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदा प्रभावित क्षेत्रों में तैनाती दी जाएगी। संसाधन भी दिए जाएंगे, जिससे परेशानी न हो।
ड्यूटी में भी परेशानी
लखनऊ से ड्यूटी रोस्टर से लगती है। होमगार्ड कहते हैं कि जबसे कंप्यूटर से ड्यूटी लगने लगी है, बड़ी परेशानी हो रही है। दूरदराज दूसरे ब्लाकों में ड्यूटी लगा दी जाती है।