देवोत्थान एकादशी पर मंदाकिनी में डुबकी लगाने को सुबह लगभग साढ़े पांच बजे मौजूद श्रद्धालु
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देवोत्थान एकादशी पर धर्मनगरी में दीपोत्सव पर्व मनाया गया। प्रात:काल मंदाकिनी में डुबकी लगाकर कामदगिरी की परिक्रमा लगाई। रामघाट में श्रद्धालुओं ने एक साथ हजारों दीप जलाकर पूजा पाठ किया। शाम को मंदाकिनी की छटा देखते ही बनती थी। बिजली की सजावट के बाद जब हजारों दीप एक साथ नदी की धारा में बहने लगे तो लगा मानों आसमां के सितारे जमीं पर उतर आएं हों। मंदाकिनी के दोनों ओर श्रद्धालु दीपदान कर पुण्य कमाते रहे।
कार्तिक मास की एकादशी पर इस वर्ष भी श्रद्धालु धर्मनगरी में विभिन्न साधनों से पहुंचे। सुबह मंदाकिनी नदी में स्नान कर मतगजेंद्र नाथ के दर्शन किए। सायंकाल रामघाट पहुंचकर दीपोत्सव के नजारे को देखने के लिए आसपास के ग्रामीण भी मौजूद रहे। नगर पालिका परिषद के आरती कार्यक्रम मेें डीएम मोनिका रानी ने चेयरमैन नीलम करवरिया व ईओ लालचंद्र सरोज के साथ दीपदान किया। रामघाट के किनारे दिए से सजाए गए। पूरे घाट में जलते दिखते रहे। इसी दौरान आतिशबाजी कार्यक्रम भी हुआ।
तरौंहा के गनपत द्विवेदी और सनद कुमार पांडेय ने बताया कि प्रत्येक वर्ष चार माह का देव शयन काल होता है। इसे चतुर्मास कहते हैं। देवउठानी एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं। एकादशी पर्व से वैवाहिक कार्यक्रम शुरू हो गए हैं।
देवोत्थान एकादशी को महिलाओं ने विधि विधान से तुलसी की पूजा की। बताया जाता है कि जलंधर अपनी पत्नी वृंदा के तपोबल के कारण अजेय बन गया। जब प्रजा जलंधर के अत्याचार से परेशान हो गई तो श्रीविष्णु ने छल का सहारा लेकर वृंदा के तप को खंडित कर दिया। इससे जालधंर युद्ध में मारा गया। वृंदा ने विष्णु को श्राप दे दिया जिससे वह पत्थर के बन गये। अंत में विष्णूजी को वृंदा से विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद वृंदा तुलसी कहर्लाइं।
घर-घर में भगवान विष्णु की पूजा के बाद देर रात तक श्रद्धालुओं ने पटाखे भी फोड़े। इस पर्व को छोटी दिवाली के रूप में भी मनाया। पूजन के कारण बाजार में गन्ना, बेर, भाजी व सिंघाड़े की मांग रही। सुबह महिलाओं ने नदी स्नान कर घाट के पास खुली दुकानोें में खरीदारी भी की।