संत मोरारी बापू ने बताया कि भजन में सात तरह के दर्शन होते हैं। इन दर्शन के भाव से ही मानस को छूने का प्रयास किया जाता है।
संयोग और वियोग को एक साथ महसूस करना कठिन काम है। यह विलक्षण भाव भरतजी में साक्षात दिखता है।
राष्ट्रीय रामायण मेला परिसर में चल रही श्रीराम कथा में शुक्रवार को संत मोरारी बापू ने भरत चरित्र पर कहा कि साधू को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं, लेकिन सब विधि करने वाला साधु भरत स्वरूप है। खुद गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि उन्हें साधु का वेश नहीं साधु का रहन सहन मिले।
साधु का स्वभाव आ जाये यही मेरी सर्वत्र मांग है। भरतजी की सौम्य और साधरणता ही साधुता का परिचायक है।
कथा वक्ता ने कहा कि राम व कृष्ण में ज्यादा अंतर नहीं है। दोनों ने समाज को जोड़ने का काम कर मानव जाति को संदेश दिया है। दोनों की कथाओं के श्रवण मात्र से कल्याण होता है। राम सत्य है उसमें रस है, कृष्ण प्रेम है उसका रास है