भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आज से शुरू होगी। नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत को चरितार्थ करने वाले यह रथ यात्रा आठ दिन में करीब नौ किमी की दूरी तय करेगी। तरौंहा के जयदेवदास अखाड़ा परिसर में रथ तैयार हो गया है। महंत रामशरणदास ने बताया कि भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा को लेकर रथ तरौंहा के रास्ते से होकर सोनेपुर गांव पहुंचेगा।
हाथ से ही ठेलने की है परंपरा
मंगलवार को तरौंहा में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के लिए विशेष रथ तैयार किया गया। लकड़ी के रथ में दो बडे़ लकड़ी के पहिए लगाए गए हैं। इस रथ को श्रद्धालु रस्सी से पकड़कर और हाथ से रथ को हांकते हैं। रथ को पकड़कर ठेलने के लिए दो लकड़ी के हत्थे लगाए गए हैं। महंत ने बताया कि परंपरा के अनुसार, रथ को हाथ से ही ठेलकर आगे बढ़ाया जाता है।
इन मार्गों से गुजरेगी यात्रा
भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा पहले दिन कच्ची छावनी में ठहरेगी। इसके बाद धुस मैदान, पुरानी बाजार, सदर रोड और सोनेपुर गांव से होकर गुजरेगी। सोनेपुर से यात्रा फिर इसी मार्ग से तरौंहा में 13 जुलाई को पहुंचेगी। जहां भंडारे के साथ यात्रा का समापन होगा।
आस्था की प्रतीक यात्रा रोचक भी
भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा आस्था का प्रतीक होने के साथ ही रोचक भी है। दरअसल, रथ यात्रा बुधवार यानि छह जुलाई से शुरू होकर 13 जुलाई को संपन्न होगी। शुरुआत तरौंहा से होगी और सोनेपुर तक जाकर यात्रा वापस तरौंहा लौटेगी। करीब नौ किमी की इस दूरी को यात्रा आठ दिनों में पूरी करेगी। इस अवधि में रोजाना यात्रा को थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ाया जाएगा। इसी लिए इस यात्रा के साथ नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत भी जुड़ी हुई है।
इस तरह रहेगी व्यवस्था
आठ दिनों तक चलने वाली रथ यात्रा के दौरान भगवान के पूजन की जिम्मेदारी आचार्य को सौंपी गई है। जो आठों दिन रथ में मौजूद रहेंगे। रथ को आगे बढ़ाने के लिए रोजाना श्रद्धालु जाएंगे और रथ को निश्चित दूरी तक ले जाने के बाद वापस लौट आएंगे लेकिन आचार्य रथ के साथ ही रुकेंगे। जो भगवान की सुबह व सांध्य की आरती के साथ ही भोग व पूजन की व्यवस्था करेंगे।