बारिश व बाढ़ से पशुओं में गला घोंटू रोग फैल रहा है। वहीं, फुटरोग होने से पशुओं के पैरों में सड़न फैलने से किसान परेशान हैं। विभागीय अधिकारी पांच लाख से अधिक पशुओं का टीकाकरण होने का दावा कर रहे हैं लेकिन गला घोंटू रोग के फैलने से उनके दावों की पोल खुल रही है।
बुंदेलखंड में प्राकृतिक आपदा के चलते पशुओं की देखभाल के लिए सरकार पशु विभाग को कई बार विशेष पैकेज दे चुकी है। पशु अधिकारी भी पशुओं के सघन टीकाकरण का दावा कर रहे हैं। विभागीय आंकड़े बताते हैं कि गला घोंटू रोग के लिए 4 लाख 6 हजार 69 पशुओं का टीकाकरण किया गया है।
इसी तरह से खुरपका व मुंहपका में 5 लाख 63 हजार 881, पोकनी रोग के लिए 11 हजार 15 सौ बकरियों का टीकारण किया गया। सितंबर से फिर पोकनी के लिए टीकाकरण किया जाएगा। हर छह माह में पशुओं का टीकाकरण होता है।
कनकोटा, भदेदहू, दिवारी, ओरा, बरूआ, सरधुआ, बेराउर, बरियारीकला, मवईकला, मंडौर, गिदुरहा, चमरौंहा, सकरौंहा व पहाड़ी क्षेत्र के गनीवां औदहा क्षेत्र में बाढ़ के बाद गांव के आसपास मौजूद गंदगी से इंसानों के साथ साथ पशुओं में भी रोग फैल रहे हैं।
इस रोग में पशु चारा खाना छोड़ देता है। जुगाली नहीं करता है। सांस व नाड़ी की गति तेज हो जाती है। पशु के गले व अगली टांगों के बीच सूजन आ जाती है। मुंह से लार टपकती है और बुखार आ जाता है। खुरपका रोग एक प्राचीन विषाणु जनित संक्रामक रोग है। इससे पीड़ित पशुओं के मुंह व खुरों में घाव हो जाते हैं। जीभ पर छाले पड़ जाते हैं।
पीड़ित पशु के मुंह को 2 प्रतिशत फिटकरी के घोल या 0,1 प्रतिशत पोटेशियम परमैगनेट के घोल से धोना चाहिए। खुरों को फिनायल से साफ करना चाहिए। इससे बचाव के लिए नियमित उपाय करने चाहिए। पहला बचाव टीका चार सप्ताह की आयु होने पर तथा दूसरा टीका उसके 6 सप्ताह बाद और तीसरा टीका दूसरे टीके के 6 सप्ताह बाद हर वर्ष लगना चाहिए।
उप मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. एचएस बवले का दावा है कि मई, जून में संघन टीकाकरण करने से पशु रोगों नियंत्रण में है। गला घोटू की शिकायत मिल रही है। जिसके लिए गांवों में टीम भेजकर पशुओं में टीकाकरण किया जा रहा है।