मवेशियों और सिंचाई के लिए तालाबों का पानी भी गर्मियों में ग्रामीणों के लिए मददगार रहा है, लेकिन इस गर्मी और सूखे ने जैसे हालात ही बदल दिए। जिले के 75 प्रतिशत तालाब सूख चुके हैं या सूखने की कगार में हैं। यह भी है कि सरकार लगातार जिला प्रशासन के माध्यम से तालाबों का महत्व समझते हुए इसके उपयोग की नई विधियां लागू कर रही है। लेकिन अभी सफलता नहीं मिल रही। कुछ स्थानीय लोगाें की भी उदासीनता है कि तालाबों में बचे पानी को संरक्षित, जल स्त्रोत बनाए रखने के लिए प्रयास नहीं करते।
बुंदेलखंड में कम बारिश से सूखा तो पड़ा ही साथ ही पेयजल का भी संकट बढ़ गया है। जल स्त्रोत बंद हो रहे हैं। मुख्य मार्गों के किनारे बने तालाबों में कभी लबालब पानी दिखता था जो अप्रैल माह में ही समाप्त सा हो गया है। मुख्यालय से सटे खोह गांव के किरहा और मोलई तालाब की बात करें तो स्थानीय लोगों का दावा है कि कभी भी इन दोनों तालाबों का पानी खत्म नहीं हुआ। इस बार स्थिति अलग है।
स्थानीय बरातीलाल पांडेय, दीप प्रकाश यादव, शिवशंकर, अजय कुमार व संतोष वर्मा ने बताया कि अभी भी इन दोनों तालाबों में ऊपर से जल समाप्त दिखाई देता है, लेकिन कुछ जल स्त्रोत अभी मौजूद हैं। सामूहिक प्रयास किए जाएं तो तालाब में गर्मी भर के लिए पानी निकाला जा सकता है। दोनों तालाब सूखने से सर्वाधिक परेशानी मवेशियों को हो रही है। साथ ही गांव के हैंडपंप से कम पानी मिल रहा है। जिससे ग्रामीण इसी तालाब के पानी से कपड़े धोते थे। जिला प्रशासन लगातार तालाब में पानी बचाने के लिए प्रयास कर रहा है।