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Chitrakoot News: बुंदेलखंड की संस्कृति की अमिट छाप छोड़ गया दीपोत्सव मेला

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चित्रकूट। धर्मनगरी का पांच दिवसीय दीपोत्सव मेला बुंदेलखंड की संस्कृति की अमिट छाप छोड़ गया। बुंदेलखंड के विभिन्न गांवों से आई टोली ने रंग-बिरंगी लाठियों से दिवारी नृत्य प्रस्तुत किया। यह परंपरा कला प्रेमियों को न सिर्फ बुंदेली विरासत को दर्शाती है बल्कि इनके संरक्षण में जुटे कलाकारों की क्षमता का अहसास भी कराती है। वहीं, मौन चराने वाले मौनियों का नृत्य भी आकर्षण का केंद्र रहा।
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दीपोत्सव मेला में गांव-गांव से दिवारी नृत्य करने वाले कलकार पहुंचे थे। इन्होंने परिक्रमा मार्ग से लेकर विभिन्न स्थानों पर लाठियां चटकाकर नृत्य प्रस्तुत कर श्रद्धालुओं का मनोरंजन किया। सभी टीमों के कलाकार अलग-अलग रंग के परिधान पहने हुए थे। ढोल के थाप व घुंघरू की आवाज के बीच कलाकार अपने हाथों से एक दूसरे के ऊपर लाठियां चटकाते रहे। इन लाठियों के वार से बचने के लिए सामने वाला कलाकार अपनी लाठी के सहारे वार को रोक लेता था। दिवारी नृत्य में सबसे ज्यादा बांदा, हमीरपुर, जालौन व महोबा जिले की टीमें आईं। इसमें बांदा के पुनाहुर, बबेरू व कमासिन कस्बे की टीम का नृत्य देखते ही बना। कमासिन के राजू यादव व भोला यादव ने बताया कि उनकी मेला में 12 वर्ष से आ रही रही है। बबेरू के राजेश यादव ने बताया कि दिवारी नृत्य करने से उन्हें बहुत खुशी होती है। यह दिवारी की परंपरा है।

आचार्य ने दिवारी टीम को किया पुरस्कृत
चित्रकूट। परिक्रमा मार्ग में बरहा के हनुमान मंदिर के पास स्थित मैदान में आचार्य विपिन विराट महराज ने दिवारी नृत्य का आयोजन कराया। इसमें 150 टीमों ने दिवारी नृत्य किया। रंग बिरंगी पोशाक में टीमों के प्रदर्शन को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ी। कई सीनियर ग्रामीणों ने भी पूरे जोश से लाठियां चलाकर दिवारी खेली। सभी टीमों को आचार्य विपिन ने पुरस्कृत भी किया गया। संवाद
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