चित्रकूट। सिविल जज (सीनियर डिवीजन) डॉ. सचिन कुमार दीक्षित ने संपत्ति विवाद के मामले में दो बैनामों को निरस्त कर दिया है। यह फैसला संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले सुनाया गया। फैसला वादी सुशीला देवी के पक्ष में आया है।
अभियोजन के पक्ष के अनुसार वादी सुशीला देवी ने प्रतिवादियों के खिलाफ बैनामा निरस्तीकरण के लिए वाद दायर किया था। उनका दावा था कि संपत्ति उनके पिता जगन्नाथ ने 16 दिसंबर 1995 को एक वसीयत के माध्यम से उन्हें, केदारिया और पवन कुमार को दी थी। बाद में पारिवारिक बंटवारे में सुशीला देवी को दो दुकानें मिलीं। प्रतिवादियों ने कथित तौर पर सुशीला देवी की गरीबी और पवन कुमार के पिता जमुना प्रसाद की लत का अनुचित लाभ उठाकर विवादित दुकानों के दो बैनामे कराए थे।
पहला बैनामा 13 अक्टूबर 2005 को पवन कुमार को नाबालिग दिखाकर किया गया था, जबकि दूसरा बैनामा पवन कुमार की मृत्यु के बाद 13 जून 2016 को जमुना प्रसाद द्वारा किया गया। प्रतिवादियों ने दावा किया कि पवन कुमार बैनामे के समय बालिग थे और बाद में कानूनी त्रुटि सुधारने के लिए दूसरा बैनामा किया गया। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और साक्ष्यों का मूल्यांकन किया। बयान व साक्ष्य के आधार पर सिविल जज सीनियर डिवीजन के न्यायाधीश डॉ. सचिन कुमार दीक्षित ने आदेश में पाया कि विवादित बैनामे अवैध और शून्य थे।
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बैजनाथ पटेल को 20 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत
चित्रकूट। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने हथियारों के साथ घर में घुसकर हमला करने के मामले में आरोपी बैजनाथ पटेल को जमानत दे दी है। उन्हें 20 हजार रुपये के व्यक्तिगत बंधपत्र और समान धनराशि की एक जमानती दाखिल करने पर रिहा किया जाएगा।
भरतकूप थाना में बैजनाथ पटेल के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उन पर हथियारों के साथ घर में घुसकर हमला करने का आरोप था। वह न्यायिक अभिरक्षा में थे। इनकी जमानत के लिए अधिवक्ता की ओर से जमानत अर्जी डाली थी। न्यायालय में सुनवाई में अधिवक्ता ने तर्क दिया कि आरोपी बैजनाथ पटेल निर्दोष हैं और उन्हें रंजिशन झूठा फंसाया गया है। अभियोजन अधिकारी ने जमानत का विरोध किया। न्यायालय ने पत्रावली का अवलोकन करने के बाद पाया कि पटेल पर आरोपित अपराध सात वर्ष से कम के कारावास से दंडनीय है। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने जमानत याचिका स्वीकार कर ली। (संवाद)
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राजाराम व उमेश को 20 हजार रुपये के बंधपत्र पर मिली जमानत
चित्रकूट। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट राजेंद्र प्रसाद भारती ने आरोपी राजाराम और उमेश उर्फ अखिलेश को 20 हजार रुपये के व्यक्तिगत बंधपत्र पर जमानत दे दी है। यह जमानत शांति भंग, आपराधिक धमकी देने के मामले में दी गई। वर्ष 2025 में थाना भरतकूप में राजाराम और उमेश उर्फ अखिलेश के खिलाफ शांति भंग, आपराधिक धमकी देने व संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। सभी आरोपी न्यायिक अभिरक्षा में थे। आरोपियों के अधिवक्ता ने इनकी जमानत के लिए न्यायालय में अर्जियां डाली थी। कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी अधिवक्ता ने तर्क देते हुए आरोपियों को निर्दोष बताते हुए झूठा फंसाने का आरोप लगाया। अभियोजन अधिकारी ने जमानत का विरोध किया। न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनने और पत्रावली का अवलोकन करने के बाद पाया कि आरोपित अपराध सात वर्ष से कम कारावास से दंडनीय है। मामला परिवाद पर आधारित होने और जमानत के पर्याप्त आधार मिलने पर प्रार्थना पत्र स्वीकार किया गया। (संवाद)
न्यायालय ने पांच आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में किया दोषमुक्त
चित्रकूट। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम सृष्टि शुक्ला ने मामले के मामले में पांच आरोपियों को दोषमुक्त किया। अभियोजन पक्ष आरोपियों पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। यह मामला थाना रैपुरा, जनपद चित्रकूट से संबंधित था।
रैपुरा थाना में नरेंद्र कुमार, धर्मेंद्र, अरुणेंद्र, सुरेंद्र कुमार व अमरेंद्र के खिलाफ पुरानी रंजिश के चलते प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इस मामले में न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किए गए। कोर्ट में सुनवाई के दौरान वादी दुर्गेश और गवाह रंजीत कुमार ने अपने बयानों से इन्कार किया। दुर्गेश ने कहा कि वह घटना के समय मौजूद नहीं था और तहरीर पुरानी रंजिश के कारण दी गई थी। रंजीत कुमार ने अदालत में बयान दिया कि वह घटना के दिन नोएडा में था और उसे घटना की कोई जानकारी नहीं थी। न्यायालय ने पाया कि मुख्य गवाहों के समर्थन के बिना आरोप सिद्ध नहीं होते। इसलिए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया गया। (संवाद)
अरविंद मिश्रा की जमानत याचिका खारिज
चित्रकूट। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय ने आरोपी अरविंद कुमार मिश्रा की जमानत याचिका खारिज कर दी है। मिश्रा पर सामूहिक दुष्कर्म के गंभीर आरोप हैं और वह जिला कारागार में बंद है।
न्यायालय में बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने मिश्रा को निर्दोष बताते हुए झूठा फंसाने का दावा किया था। उन्होंने कहा कि मिश्रा का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने जमानत का कड़ा विरोध किया। न्यायालय ने अभियोजन प्रपत्रों का अवलोकन करने के बाद पाया कि मिश्रा के खिलाफ दर्ज अपराध गंभीर प्रकृति का है और अजमानतीय है। यह मामला सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत का पर्याप्त आधार नहीं पाया। (संवाद)