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चित्रकूटः होली खेले रघुवीरा अवध में...के साथ रामायण मेला संपन्न

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फोटो- 7- चित्रकूट में रामायण मेला के अंतिम दिन भजन गायन सुनातीं लोकगीत गायिका मालिनी अवस्थी। - फोटो : CHITRAKUTT
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चित्रकूट। रामायण मेले के समापन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्त लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने टीम के साथ गीतों और भजनों का प्रस्तुतिकरण किया। देर रात तक रामायण मेला भवन में दर्शक रोमांचित होते रहे। इसके बाद वृदांवन की मशहूर रासलीला में भगवान श्रीकृष्ण राधा की फूलों की होली आकर्षण का केंद्र रही।
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धर्मनगरी चित्रकूट में चल रहे पांच दिवसीय प्रांतीय कृत राष्ट्रीय रामायण मेला के समापन पर लोक गायिका मालिनी अवस्थी चित्रकूट पहुंची। जहां उन्होंने अपने गीतों से लोगों को झूमने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने अपने दो घंटे के शानदार कार्यक्रम में राम के जीवन काल पर आधारित गीत सुनाए। साथ ही होली का गीत होली खेले रघुवीरा गाना गाकर सुरों का जलावा बिखेरा।
रात में कार्यक्रम की अगली कड़ी मेें वृंदावन की ख्याति लब्ध रास एवं रामलीला मंडली के पं. देवकी नंदन शर्मा के नेतृत्व में वृंदावन रासलीला संस्थान के कलाकारों ने होली लीला की मनोहारी प्रस्तुति देकर रामायण मेला के इस सत्र का समापन किया। मेले के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश कुमार करवरिया ने आगंतुकों का धन्यवाद किया। समारोह को व्यवस्थित रुप से संचालित करने के लिये मेले के पांचों दिन पूजा-अर्चना समिति, शोभायात्रा समिति, कार्यालय, स्वागत, आवास व्यवस्था, परिवहन व्यवस्था, भोजन व्यवस्था, साउंड एंड लाइट, मंच व्यवस्था जैसी अनेक समितियों के प्रद्युम्न कुमार दुबे (लालू भैया), राजाबाबू पांडेय, शिवमंगल प्रसाद शास्त्री, मो यूसुफ, मो इम्तियाज, ज्ञानचंद्र गुप्ता, राजेन्द्र मोहन त्रिपाठी, माधव बंसल, पंकज अग्रवाल, आशीष पांडेय, बिहारी बाबू, नत्थू प्रसाद सोनकर, दद्दू महाराज, मुन्ने खां, बबली कुशवाहा, भोलाराम, मनोज गर्ग, कलीमुद्दीन बेग, घनश्याम अवस्थी, प्रिंस करवरिया आदि ने मेले की संपूर्ण व्यवस्थाओं को व्यवस्थित ढंग से संचालित किया। राष्ट्रीय रामायण मेला के महामंत्री करुणा शंकर द्विवेदी ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन किया।
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अपनी लोक संस्कृति पर करें फर्क तो होगी उन्नित
चित्रकूट। रामायण मेला परिसर में मालिनी अवस्थी ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा है कि चित्रकूट के श्रोताओं में जो सरलता देखने को मिली वह दूसरी जगह नहीं मिलती। यहां सब लोग साथ में गा रहे थे, नाच रहे थे, बाकी जगह ऐसा नहीं होता है। यह नगरी पूरी तरह राममय है फाल्गुन का महीना ही गीत-संगीत का होता है और होली का मौसम है आनंद हो। हर पर्व के पीछे यही संदेश है भाईचारा हो, आनंद हो, खुशहाली हो। बुंदेली लोकगीत और बुंदेली भाषा के पराभाव के लिए स्थानीय लोगों को ही दोषी बताते हुए कहा कि जिस दिन हम अपनी लोक संस्कृति पर फर्क करना सीख जाएंगे, उस दिन से हमारी लोक संस्कृति उन्नति करने लगेगी। उन्होंने कहा कि वह धर्मनगरी में कई बार कार्यक्रम प्रस्तुत करने आ चुकी हैं। यहां के प्राकृतिक वातावरण को बरकरार रखना चाहिए। इस क्षेत्र का कई मायनों में विकास हो रहा है।
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