राजापुर (चित्रकूट)। क्षीरसागर भवन में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन वृंदावन के कथावाचक वागीश महाराज ने कहा कि जब जीवन में कथा आती है तो व्यथा दूर हो जाती है। भागवत कथा शोक, दुख और संताप से मुक्ति दिलाती है। जिस घर में श्रीमद्भागवत होती है वह घर तीर्थ हो जाता है।
उन्होंने कथा में मन लगाने की बात कही। बोले, जब तक वक्ता और श्रोता एकाग्र नहीं होते तब तक आनंद नहीं मिलता। उन्होंने सात वासना रूपी ग्रंथियां बताईं- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अग्निवेश, अहंकार, ममता। कहा कि इनसे परे होकर ही भक्ति में लीन व्यक्ति को कथा का आनंद मिल सकता है। उन्होंने बताया कि भागवत कथा का मुख्य धर्म सभी जीवों पर दया करना है। प्रभुनाम में लीन रहना है। दया का भाव आते ही भगवान की कृपा आ जाती है और कृपा आते ही भक्ति मिल जाती है। उन्होंने कहा कि जो लोग नियमित रूप से श्रीमद्भागवत की कथा सुनते हैं उनको राजसूय या अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। कथा के प्रसंग में भक्तिलीन होकर कई बार आस्थावान नाचने लगे। इस दौरान माताबदल, पुंडरीक, प्रदीप, कैलाश द्विवेदी, प्रेमनारायण, राधेश्याम सोनी, भूपेंद्र द्विवेदी आदि मौजूद रहे।