चित्रकूट। यथा राजा तथा प्रजा, यह कहना है देश के राजनीतिक और सामाजिक चरित्र के बारे में मऊ निवासी देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भुवनेश्वर प्रसाद शुक्ल का। मात्र 17 वर्ष में ही देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा लेकर 1941 ईस्वी में बस्ती के जुवेनाइल कारागार में तीन महीने जेल में बिताने वाले शुक्ल ने कहा कि आज के प्रजातंत्र में राजनीतिक, प्रशासनिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अनुशासनहीनता पैदा हो चुकी है।
जिले की जीवित किंवदंती बन चुके एकमात्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री शुक्ल का कहना है कि आजादी के बाद जहां एक तरफ आर्थिक विकास, सामाजिक समानता का मौका मिला। वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति की प्रतिमूर्ति व्यक्तिगत चरित्र का घोर अवमूल्यन हुआ। शुक्ल इसका कारण पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण और टेलीविजन को मानते हैं। अंग्रेजी शासन के बारे में शुक्ल का कहना है कि अंग्रेज हमारे देश में शासन करने आए थे जिसकी वजह से उनके कानून का डंडा भारतीय जनता के ऊपर बेरहमी से चलता था। उनकी जुबान ही कानून होती थी। उन्होंने कहा कि अंग्रेज हिंदुस्तानियों को निकृष्ट मानते थे। यहां तक कि रजवाड़े तक भी अंग्रेजों से मिलने के लिए विशेष भेंट लेकर जाया करते थे जबकि आजादी के बाद आज वही अंग्रेज बड़े फक्र के साथ भारतीयों से हाथ मिलाते और साथ में खाना खाते हैं। वहीं प्रजातंत्र में राजनीतिक, प्रशासनिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अनुशासनहीनता पैदा हो चुकी है।
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...सभी पार्टियों पर बरसे शुक्ल
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भुवनेश्वर प्रसाद ने सभी पार्टियों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि देश में बहुत सी पार्टियों का होना भी भारतीय लोकतंत्र की एक खामी के रूप में सामने आ रहा है। इससे अपराधीकरण और राजनीतिक तुष्टीकरण पनप रहा है। उन्होंने तो यह भी कहा कि आज के हालात देखते सभी पार्टियों को समाप्त कर व्यक्तिगत चरित्र के आधार पर सांसद व विधायक चुने जाएं।
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‘बागियों की तरह जीवन जीते थे स्वतंत्रता सेनानी’
पुरानी यादों को ताजा करते हुए शुक्ल ने कहा कि सोलह से अट्ठारह साल से लेकर देश की आजादी तक चलने वाले सभी आंदोलनों के बीच वे लोग बागियों की तरह ही रात के अंधेरे में घर में घुसते और भोर के अंधेरे में घर से बाहर निकल जाते थे। वे बताते हैं कि उनके पिता स्व. शीतल प्रसाद शुक्ल व माता सुखदेइया देवी भी काफी परेशान रहा करते थे। उन्हें सन 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान एक महीने के लिए बस्ती की जुवेनाइल जेल में और 1942 में तीन साल की सजा के तहत बांदा जेल में बंद रहे।
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‘राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में उलझे रहते हैं नेता’
वीरों की भूमि बुंदेलखंड में गरीबी और बेरोजगारी के लिए वे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता व पहले की सरकार के कामों को पलटने और वर्चस्व कायम करने की इच्छा को मानते है। उन्हाेंने कहा कि जब तक बेरोजगार हाथों को बुंदेलखंड में ही काम नहीं पैदा होगा इसका कुछ भी भला होने वाला नहीं है। कांग्रेस की सरकार के फैसले को भाजपा ने पलटा और भाजपा के फैसलों को कांग्रेस ने। सपा बसपा भी एक दूसरे के कामों को उलटते पलटते रहते हैं इसी में पांच साल बीत जाता है।