चित्रकूट। महाकवि तुलसीदास की जन्मभूमि के विवाद को लेकर यहां के प्रबुद्ध वर्ग में भी आक्रोश है। इनका कहना है कि विभिन्न साक्ष्यों के बाद भी राजापुर को लेकर भ्रांति पैदा करना मूर्खता ही कहा जा सकता है।
प्रख्यात चिंतक और हिंदी प्रवक्ता पद से सेवानिवृत्त योगेंद्र दत्त द्विवेदी ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी जब सिंचाई मंत्री बने थे तो उन्होंने तुलसी जन्म स्थान की सुरक्षा के लिए राजापुर में विशाल घाट बनवाया था। उन्होंने रचनाओं का उदाहरण लेते हुए बताया कि जब तुलसी अनाथ हो गए तो उनको नरहरिया नंद महाराज अपने साथ सूकर खेत (सोरों) ले गए। तुलसीदास ने लिखा है- मैं पुनि निज गुरु सन सुनी, कथा सो सूकरखेत/ समुझी नहितस बालपन, तब अति रह्यो अचेत। केवल इस दोहे के आधार पर लोगों को जन्मस्तान सोरों कहने का मौका मिल गया। उन्होंने बताया कि रामायण में राम गमन का मार्ग इलाहाबाद से राजापुर और राजापुर से वाल्मीकि आश्रम तक है। इलाहाबाद से वाल्मीकि आश्रम तक आने का यह मार्ग अधिक सीधा और कम दूरी का है जब भगवान राम राजापुर के पास यमुना पार करते हैं तो मानस लिखते तुलसी भावुक हो जाते हैं, वह सोचते हैं कि यदि वह उस समय होते तो क्या करते- तेहि अवसर एक तापस आवा/तेजि पुंज लघु बयस सुहावा। कवि आलखित गति वेष विरागी/मन क्रम बचन राम अनुरागी। उन्होंने कहा कि तुलसीदास के पारिवारिक लोग राजापुर में हैं। तुलसीदास के समकालीन कुटुंबियों की ग्यारहवी पीढ़ी चल रही है। ऐेसे में तुलसीदास की जन्मभूमि का विवाद उचित नहीं है। उधर, महंत दिव्यजीवन दास, महंत रामजीदास, साध्वी पुष्पा रामायणी, भाजपा नेता रंजना उपाध्याय, राघवेंद्र सिंह, शैल गुप्ता, संतोष उर्फ मुन्ना सिंह आदि ने भी कहा कि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म यमुना तट पर राजापुर में आत्माराम दुबे के यहां हुआ था और इसके तमाम साक्ष्य हैं। कहा कि अगर विवाद न सुलझा तो सड़क पर उतरा जाएगा।