चकिया। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम में संशोधन के बाद वन्यजीवों का शिकार करने उन्हें पकड़ने जाल में फंसाने या विष देकर मारने पर कानूनों को और सख्त कर दिया गया है। कानून के सख्त होने के बावजूद वन्यजीवों की संख्या उतनी तेजी से नहीं बढ़ी हैै, जितना बढ़नी चाहिए। काशी वन्य जीव प्रभाग में वन्यजीवों की गणना 2016 के बाद नहीं हुई है। जबकि हर तीन वर्ष पर गणना होनी चाहिए। इसके कारण वन्यजीवों की संख्या में अब तक कितनी वृद्धि हुई उसके आंकड़े नहीं हैं। एक अनुमान के अनुसार हिंसक वन्य जीवोें की संख्या घटी जब अहिंसक वन्यजीवों की संख्या में वृद्धि होने के संकेत मिल रहे हैं।
काशी वन्यजीव प्रभाग के 74 हजार हेक्टेयर में फैले वन क्षेत्र में ही प्रदेश के पुराने वन्य जीव विहारों में से एक चन्द्रप्रभा वन्यजीव विहार भी स्थित है। इस वन क्षेत्र में वन्यजीवों के अलावा पक्षियों तथा सरीसृप प्रजातियों की बड़ी संख्या पाई जाती है। यहां तेंदुआ, भालू, चिंकारा, चितल, चैसिंघा, सांभर, लकड़बग्घा, लोमड़ी, जंगली, सूअर, जंगली बिल्ली, शाही, खरगोश, बंदर, लंगूर, नीलगाय पाए जाते हैं। 1970 के पूर्व इस वन क्षेत्र में बाधों की भी गर्जना सुनाई पड़ती थी पर अब ऐसा नहीं है। वन क्षेत्र पर बढ़ते जैविक दबाव तथा खुला वन क्षेत्र होने के कारण वन क्षेत्रों में मानव के बढ़ते दखल से वन्यजीवों के सुरक्षित प्रवास स्थल विलुप्त होते जा रहे है। वन विभाग क की माने तो कड़े कानून के चलते वन क्षेत्र में वन्यजीवों की संख्या बढ़ी है, लेकिन तेंदुआ, भालू की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। इसकी अपेक्षा बंदर, लंगूर, नीलगाय, जंगली सूअर, चिंकारा, चौसिंघा, सांभर की संख्या बढ़ी है।
वन क्षेत्र में वन्यजीवों के शिकार पर कानूनों के खड़ा होने का प्रभाव पड़ा है। शिकार की घटनाएं नहीं हो रही है, लेकिन वन क्षेत्र में बढ़ती आबादी के चलते वन्य जीवों की संख्या बढ़ने पर काफी असर पड़ा है। यह चिंता विषय है।
बृजेश पांडेय, वन क्षेत्राधिकारी
चंद्रप्रभा वन्यजीव विहार
वन्यजीवों के साथ मानवों का सहअस्तित्व आवश्यक है। इसलिए वन्यजीवों के संरक्षण के लिए वनवासियों की सक्रियता जरूरी है।
महावीर कौजलगी, डीएफओ