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जैविक दबाव, अनियंत्रित विकास के चलते सिमट रहे वेटलैंड

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चकिया। बढ़ती जनसंख्या के कारण प्राकृतिक संसाधनो पर बढ़ रहे जैविक दबाव तथा अनियंत्रित विकास के चलते वेटलैंड सिमटते जा रहे हैं। इसके कारण अनेक तरह की समस्याएं सामने आ रही है। वेटलैंड के संरक्षण के लिए जन भागीदारी तथा जागरूकता आवश्यक है। ये बातें राजदरी जलप्रपात पर विश्व वेटलैंड दिवस के अवसर पर राजदरी सभागार में आयोजित गोष्ठी में काशी वन्य जीव प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी दिनेश सिंह ने कहीं।
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उन्होंने कहा कि 1971 में इरान के रमसर शहर में वेटलैंड को बचाने के लिए पर्यावरण विदों एवं प्रकृति वैज्ञानिको की बैठक हुई। इसमें वेटलैंड को संरक्षित करने पर सहमति बनी थी। दो फरवरी 1997 से संपूर्ण विश्व में वेटलैंड दिवस के आयोजन की घोषणा की गई। उन्होंने कहा कि वर्तमान में पूरे विश्व में कुल 2424 वेटलैंड को रमसर साइट पर जगह मिल चुकी है। पूरे भारत में 47 वेटलैंड इस साइट पर जगह पा सके हैं। उत्तर प्रदेश में अब तक कुल नौ वेटलैंड को रमसर साइट पर स्थान मिला है। काशी वन्य जीव प्रभाग में स्थित सुरहा ताल को भी जल्द ही इस साइट पर स्थान मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि वेटलैंड के तहत बड़े जलाशय, ताल, तलैया, पोखरा, घास के मैदान, दलदली क्षेत्र सहित तमाम स्थान आते हैं। वेटलैंड के सिमटने से भूगर्भीय जलस्तर प्रभावित होता है। इसलिए वेटलैंड का संरक्षण जरूरी है। उन्होंने कहा कि वेटलैंड ईको सिस्टम में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। पर्यावरण संरक्षण में भी वेटलैंड का योगदान है। गोष्ठी में पर्यावरण विद परशुराम सिंह, उप प्रभागीय वनाधिकारी धर्मेन्द्रनाथ सिंह, उप प्रभागीय वनाधिकारी दिलीप तिवारी, चकिया रेंजर अकबाल बहादुर सिंह, राजपथ रेंजर ताराशंकर यादव, चंद्रप्रभा रेंजर बृजेश पांडेय, रामसकल कोल रहे। संचालन उप प्रभागीय वनाधिकारी दिलीप तिवारी ने किया।
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