प्राचीन भारतीय परंपराओं को जीवंत रखने में जुटी नरौली स्थित श्रीगरुड़ध्वज रामानुज दास राम रक्षा वेद पाठशाला में सुबह सुबह वैदिक मंत्र गूंजते रहते हैं। पर इन दिनों अर्थाभाव से जूझ रही है। जिससे बटुकों के अध्ययन, भोजन, आवास की समुचित व्यवसथा नहीं हो पा रही है। वर्तमान में यहां बच्चे और तीन आचार्य हैं।
स्थानीय बाजार से मात्र एक किमी दूर उत्तर में गंगा तट पर स्थित नरौली की वेद पाठशाला जीयर स्वामी मठ वालीशाही, जगन्नाथपुरी उडीसा द्वारा संचालित होती है। इस गुरुकुल में संस्कृत माध्यम से प्रथमा से सातवें तक की शिक्षा बच्चों को दी जाती है। ट्रस्ट द्वारा अध्ययनरत बटुकों के लिए भोजन, वस्त्र, कापी, किताब आदि की व्यवस्था की जाती है। एक समय यहां बटुकों की संख्या अधिक होती थी और वेद की ऋचाओं के समवेत पाठ से तटवर्ती इलाका गूंजता रहता था। लेकिन वर्तमान में हालात बदल चुके हैं। ट्रस्ट की ओर से अपेक्षित पैसा नहीं मिल पाता है और जिला प्रशासन की ओर से कोई सहायता नहीं मिलती है।
इसकी वजह से परंपरागत इस शिक्षा व्यवस्था पर असर दिख रहा है। वर्तमान में यहां 26 वटुक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। गुरुकुल के प्रधानाचार्य रमेश कुमार द्विवेदी ने बताया कि गुरुकुल के नाम से एक हेक्टेयर खेती योग्य भूमि है। यहां पैदा होने वाले अनाज से बटुकों के लिए भोजन की कमी नहीं होती है , लेकिन 26 बटुकों और तीन आचार्यों का खर्च पूरे वर्ष तक नहीं चल पाता है। पाठशाला मंे सबसे बड़ी समस्या ईधन की है। भवन की कमी की वजह से बटुकों को खुले में शिक्षा ग्रहण करना पड़ता है। कहा कि कई बार जनप्रतिनिधियों का भी ध्यान आकृष्ट कराया गया, लेकिन पुरातन पंरपंरा को बचाने के लिए कोई नहीं आया।