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Chandauli News: काशी के किसी शिवलिंग में नहीं है अरघे के नीचे नाग, डोमरी मिला शिवलिंग अहिल्याबाई के काल का

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डोमरी में गंगा से निकले ​शिवलिंग के अरघे के नीचे बनी नाग की बड़ी आकृति और फन। संवाद - फोटो : तेंदुए के हमले में घायल बच्ची को ले जाते लोग।
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गंगा की धारा ने एक बार फिर इतिहास और आस्था के रहस्य को उजागर किया है। गंगा पार डोमरी क्षेत्र में 5 जून को मछुआरों के जाल में निकला लगभग दो क्विंटल का शिवलिंग अब श्रद्धा, रहस्य और इतिहास के केंद्र में आ गया है। देश के वरिष्ठ इतिहासकार, मूर्तिकला और स्थापत्यविद् प्रो. मारूतिनंदन प्रसाद तिवारी ने बताया कि काशी में कहीं ऐसा शिवलिंग नहीं है जिसके अरघे के नीचे नाग की आकृति हो। काशी के संस्कृति एवं भूगोल के विशेषज्ञ प्रो. राणा पी.बी. सिंह ने बताया कि यह नागेश्वर शिवलिंग है और अहिल्याबाई होल्कर के समय का लग रहा है। इस शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता उस पर बने चार नाग और अरघे के नीचे उकेरी गई दुर्लभ नाग आकृति है।
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सूजाबाद क्षेत्र के मछुआरे सुनील साहनी, जितेंद्र साहनी, बाबू साहनी, गंगा साहनी और आकाश साहनी जब गंगा में जाल डालकर मछली पकड़ रहे थे, उसी दौरान उनके जाल में यह विशाल शिवलिंग फंस गया। भारी होने के कारण इसे बाहर निकालने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। अगले दिन क्षेत्र के कन्हैया पहलवान, मुन्ना यादव, लालबाबू निषाद सहित करीब 15 लोगों ने मिलकर इसे घाट पर बने गंगा चबूतरे पर स्थापित किया। इसकी जानकारी नमामि गंगे के चंदौली जिला परियोजना अधिकारी दर्शन निषाद ने प्रशासन को दी। सूचना फैलते ही दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। शिवलिंग की आकृति और उस पर उकेरे गए चार नाग लोगों के बीच कौतूहल और चर्चा का विषय बन गए।
प्रो.राणा पी.बी.सिंह, काशी की संस्कृति और भूगोल के विशेषज्ञ और पूर्व विभागाध्यक्ष, बीएचयू ने कहा कि तीन या उससे अधिक नागों वाले शिवलिंग को नागेश्वर शिवलिंग कहा जाता है और ऐसे शिवलिंग अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं। चार नाग चार दिशाओं के रक्षक माने जाते हैं। अरघे के नीचे बना नाग धरती की रक्षा और उसका बोझ उठाने का द्योतक है। प्रारंभिक स्वरूप देखने पर यह शिवलिंग कम से कम 18वीं शताब्दी का प्रतीत होता है। यह शिवलिंग महारानी अहिल्याबाई होल्कर के समय का हो सकता है। यह भी संभव है कि किसी आक्रमण या अन्य कारणों से इसे गंगा में विसर्जित या फेंक दिया गया हो।
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प्रो. मारूतिनंदन प्रसाद तिवारी, वरिष्ठ इतिहासकार, मूर्तिकला और स्थापत्यविद्, पूर्व विभागाध्यक्ष, बीएचयू ने कहा कि शिवलिंग पर नाग, पुरुष और प्रकृति तथा शिव-शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। काशी के ललिता घाट और पंचकोशी क्षेत्र में चार नागयुक्त शिवलिंग मौजूद हैं, लेकिन अरघे के नीचे नाग की आकृति वाला ऐसा शिवलिंग काशी में दूसरा कहीं नहीं दिखा। संभव है जिसने इसे बनाया होगा उसने इसे अलग आकृति दी हो।


उमाशंकर गुप्ता, संचालक, काशी प्रदक्षिणा समिति ने कहा कि

प्रदक्षिणा और तीर्थ यात्रा के अभियान के तहत काशी के लगभग सभी पौराणिक मंदिरों के 30 से ज्यादा बार भ्रमण किया है पर चार नागों की ऐसी आकृति वाला शिवलिंग कहीं नहीं दिखा। यह शिवलिंग वाकई अनूठा है।
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इनसेट
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शिवलिंग पर कहां-कहां बनी है चार की आकृति
पहला नाग-डोमरी में गंगा से मिले शिवलिंग के अरघे के नीचे घेरकर एक बड़ा नाग है। जिसका फन अरघे के अगले भाग के ठीक नीचे है।

दूसरा नाग-अरघे के अगले भाग में बना हुआ है। यह नाग भी सीधा नहीं बल्कि बीच से घूमा है।
तीसरा नागशिवलिंग के ठीक नीचे लिपटा हुआ है और उसका फन अरघे की तरफ है।

चौथा नागशिवलिंग के ऊपर है यानी अरघे के अग्र भाग की विपरीत दिशा में है। यह नाग सबसे छोटा है।
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इनसेट


क्या है नागेश्वर शिवलिंग?
तीन या उससे अधिक नागों वाले शिवलिंग को नागेश्वर शिवलिंग कहा जाता है

ऐसे शिवलिंग अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं
चार नाग चार दिशाओं के रक्षक माने जाते हैं

धार्मिक मान्यता में इसे विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त है
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विशेषज्ञों की नजर में खास क्यों?
- अरघे के नीचे नाग की अनूठी आकृति

- चार नागों का दुर्लभ स्वरूप
- 18वीं शताब्दी का होने की संभावना

- अहिल्याबाई काल से जुड़ाव की आशंका
- काशी में ऐसा दूसरा स्वरूप नहीं मिला

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चार सर्प चार वेद, चार पुरुषार्थ के प्रतीक
काशी के संस्कृति एवं भूगोल के विशेषज्ञ प्रो.राणा पी.बी. सिंह ने बताया कि शिवलिंग पर 4 फन वाले सर्प का अंकन बहुत ही शुभ और गहरा आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह केवल एक सजावट नहीं, बल्कि सनातन धर्म में गहरी ऊर्जा और प्रतीकों का प्रतिनिधित्व है। चार वेदों का प्रतीक हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग के चारों ओर लिपटे या फन फैलाए हुए 4 सर्प चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का प्रतीक माने जाते हैं। 4 सर्प मानव जीवन के चार लक्ष्यों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को दर्शाते हैं।
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