गंगा का जलस्तर एक बार फिर तेजी से बढ़ रहा है।
पिछले तीन
दिनों में जल स्तर में इतनी वृद्वि हो चुकी है कि अब गंगा खतरे के निशान से
लगभग चौदह फीट ही नीचे बह रही हैं। बढ़ते जल स्तर को देख तटीय क्षेत्र के
लोग अभी से बचाव के लिए गंभीर हो गए हैं।
पशुओं को लोग अभी से
सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने लगे हैं।
वहीं अब तक सुरक्षा और बचाव को लेकर
प्रशासनिक उदासीनता से ग्रामीणों में रोष व्याप्त है।
ग्रामीणों का कहना
है कि हर वर्ष बाढ़ आने पर जब डूबने की नौबत आती है तब जनप्रितिनिधि और
प्रशासन चेतता है और बचाव कार्य शुरू करता है।
जनप्रतिनिधि भी केवल झूठी
वाहवाही और सहानुभूति बटोरने के लिए बाढ़ आने पर बचाव के लिए आते हैं लेकिन
पहले से सुरक्षा और बचाव को लेकर न तो प्रशासन कार्य करता है और न ही
जनप्रतिनिधि।
नियामताबाद विकासखंड के कुंडा खुर्द, कुंडा कला, सहजौर,
मवई कला समेत आधा दर्जन गांव, चहनियां विकासखंड के रौना, कैली, कुरहना,
भूपौली, बलुआ, सराय, जूड़ा हरधन, पूरा गणेश, विजयी का पूरा, मारूफपुर
समेत एक दर्जन से अधिक गांव और धानापुर विकासखंड के नौघरा, बुद्धपुर,
नरौली, आमादपुर, गुरैनी, जिगना, बीरासराय, महुजी समेत दर्जनभर से अधिक
गांव प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित होते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि
प्रशासन और जनप्रतिनिधि बाढ़ आने पर बचाव कार्य के लिए आकर वाहवाही लूटते
है।
दुलहीपुर संवाददाता के अनुसार पड़ाव से लेकर कैली कुरहना तक जल स्तर
बढ़ने से कटान का अंदेशा बढ़ गया है। तटीय क्षेत्र के ग्रामीणों में अभी से
संशय है कि पता नहीं प्रशासनिक सुरक्षा की जाएगी अथवा नहीं। कुंडा
खुर्द की मल्लाह बस्ती के लोगों ने जलस्तर बढ़ते देख अपना सामान समेट लिया
है। मछुआरे मछली पकड़ने के लिए गंगा मे नहीं जा रहे हैं।
मुकेश,
जमुना, रामशरण, पंकज आदि मल्लाहों ने बताया कि दशहरा के बाद जलस्तर गिरने
पर ही फिर हमलोग मछली मारने के लिए गंगा में उतरेंगे। प्रधान बसंत यादव ने
कहा कि सबसे अधिक कटान कुंडा खुर्द में है। वर्ष 2013 जैसी बाढ़ की स्थिति
आई तो संभव है कि कुंडा मल्लाह बस्ती नदी में समा जाए ।
चहनियां
संवाददाता के अनुसार गंगा का जल स्तर करीब छह फीट सामान्य से अधिक हुआ है
लेकिन खतरे के निशान से नीचे है। तटीय क्षेत्र के लोग आपदा से पूर्व बचाव
की तैयारियों में जुट गये है।
नौघरा, बुद्धपुर, नरौली आदि ऐसे गांव है
जहां बाढ़ का पानी घरों तक में घुस जाता है इसे लेकर लोग अभी से सतर्क हो
गये हैं। अपने रहने और पशुओं के लिए भी व्यवस्था देखने लगे हैं।