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बलुआ गंगा घाट पर हजारों स्नानार्थियों ने लगाई आस्था की डुबकी

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चहनियां। देवोत्थान एकादशी पर बलुआ स्थित पश्चिम वाहिनी गंगातट पर हजारों स्नानार्थियों ने आस्था की डूबकी लगाई। स्नान के बाद भक्तों ने दान किया। गंगा तट पर स्थित भीमसेन की पूजा अर्चना की। महिलाओं ने मूली और बैगन का दान किया। गंगा तट पर पूरे दिन हर-हर गंगे की जयकारे गूंजते रहे। भीड़ को देखते हुए बुलआ थाना निरीक्षक राजीव सिंह ने दल-बल के साथ गश्त करते रहे। वहीं गंगा सेवा समिति के अध्यक्ष दीपक जायसवाल ने गंगा सेवकों के साथ लोगों की सहायता में जुटे रहे। सुरक्षा के मद्देनजर गंगा तट पर एनडीआरएफ की टीम लगी रही। कार्तिक मास में स्नान-दान का बहुत महत्व है। वहीं देवोत्थान एकादशी पर स्नान का सर्वाधिक महत्व है। इस दिन स्नान करने से भगवान विष्णु खुश होते हैं। इन्हीं परंपराओं का निर्वहन करते हुए शुक्रवार को बलुआ स्थित पश्चिम वाहिनी गंगा तट पर हजारों श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई। गंगा स्नान के लिए सुबह से ही भक्त जुटने लगे। स्नान का सिलसिला दोपहर बाद तक चलता रहा। भक्तों ने हर-हर गंगे के जयकारे लगाते हुए गंगा में डूबकी लगाई। महिलाओं ने गंगा में स्नान के बाद मूली और बैगन दान किया। वहीं घाट पर बने अस्थायी भीमसेन की पूजा-अर्चना की। भीड़ को देखते हुए सभी छोटे बड़े वाहनों को बलुआ पुलिस ने बाल्मीकि इंटर कॉलेज के मैदान में पार्किंग करा दिया । बलुआ बाजार से लेकर घाट तक बड़ी संख्या में फोर्स तैनात रही। बलुआ थानाध्यक्ष राजीव सिंह घाट पर तैनात रहे। वही गंगा सेवा समिति के अध्यक्ष दीपक जायसवाल गंगा सेवकों के साथ लोगों की मदद करने में लगे रहे।
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विधि विधान से तुलसी और भगवान विष्णु का कराया विवाह
पीडीडीयू नगर। हरि प्रबोधनी देवोत्थान एकादशी का पर्व जिले भर में शुक्रवार के धूमधाम से मनाया गया। भक्तों ने सुबह गंगा स्नान किया और शाम के वक्त घर के आंगन में माता तुलसी और भगवान विष्णु का विवाह कराया। बाद में देवताओं को नए गुड़, कंद, फल आदि अर्पित की और भव्य आरती उतारी। बाद में प्रसाद स्वरूप गन्ने का प्रसाद लिया। एकादशी के साथ ही चतुर्मास का समापन हुआ और चार माह से रुके वैवाहिक कार्य शुरू हो गए। हालांकि शुक्रास्त होने के कारण 22 नवंबर को पहला लग्न मुहूर्त है। मान्यता है कि चतुर्मास के बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु योग माया से जागते हैं। आज के दिन भगवान विष्णु और तुलसी का विवाह हुआ था। इसी उपलक्ष्य में घरों में व्रत पूजन किया जाता है। घरों में तुलसी और विष्णु का विवाह कराया जाता है। देवात्थान एकादशी व्रत की तैयारी बृहस्पतिवार से ही शुरू हो गई थी। बाजार में जगह-जगह गन्ने उतार दिए गए। इसके अलावा नए गुड़, पानी फल सिंघाड़ा, कंद, अमरूद सहित अन्य फलों की खूब खरीददारी हुई। शुक्रवार की सुबह घरों के लोगों ने व्रत का संकल्प लिया। लोग वाराणसी सहित आस पास के गंगा घाटों पर स्नान ध्यान के लिए गए। इसके बाद लोगों ने घरों में ने गीत गाए। शाम के वक्त तुलसी के पौधे के समीप गन्ने का मंडप सजाया और विधि विधान से विवाह कराया। विधि विधान से पूजा अर्चना के बाद भगवान को फल, फूल, धूप, दीप अर्पित की। घरों में महिलाओं ने गीत गाए। बाद में भगवन की आरती उतारी और प्रसाद का वितरण किया। इस दौरान भगवान के जयकारे लगते रहे।
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