पीडीडीयू नगर। सरकार देश के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा पहुंचाने के लिए संकल्पित है। सर्व शिक्षा अभियान, सब पढ़ें, सब बढ़ें सहित दर्जनों योजनाएं कई वर्षों से चल रही हैं। ै पर आज भी ऐसे बच्चे हमारे समाज में हैं जो पारिवारिक लाचारी और गरीबी की वजह से कलम पकड़ने की उम्र में कूड़ा बटोरने को मजबूर हैं। पीडीडीयू नगर के रेहान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। 14 वर्ष का रेहान आज तक यह नहीं देख पाया है कि स्कूल होता कैसा है। आठ वर्ष से ही कूड़ा बेचकर परिवार के राशन का इंतजाम करने की जिम्मेदारी मिली।
पीडीडीडीयू नगर के महमूदपुर के निवासी रेहान के पिता बबलू और भाई इलियाश भी कूड़ा बेचते हैं। घर में मां के अलावा एक छोटा भाई सलमान और बहन जाफरीन भी है। रेहान हर सुबह पांच बजे रिक्शाट्राली लेकर पीडीडीयू नगर के लिए निकल जाता है। वह होटल और रेस्टूरेंट जाकर वहां जमा कूड़े से बीयर और शराब की बोतलें, प्लास्टिक की बोतलें जमा करता है। रेहान ने बताया कि वह आठ साल की उम्र से यह काम कर रहा है। पहले बोरा लेकर उसमें कूड़ा जमा करता था। अब ट्राली चलाने लगा है तो उसमें कूड़ा जमा करता है। बताया कि वो उसके पिता और भाई रोजाना कूड़ा बीनते हैं। इसे घर के पास इक्ट्ठा करते हैं और महीने में एक बार बेचते हैं। इससे सात से आठ हजार रुपये मिल जाते हैं। उसने बताया कि उसके पिता मूल रूप से वर्धमान के रहने वाले हैं। यहां काफी पहले आए और तब से किराए पर ही परिवार रह रहा है। दूसरे जगह के होने की वजह से न तो राशन कार्ड बन पाया है और न ही किसी सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाता है।
पीडीडीयू नगर। रेहान ने बताया कि उसे दूसरे बच्चों की तरह पढ़ने की इच्छा होती है पर मजबूरी यह है कि अगर वह कूड़ा नहीं बीनेगा तो परिवार का खर्च नहीं चल पाएगा। पढ़ने क्यों नहीं जाते के सवाल पर उसका जवाब था-‘पढब त खाइब का’। रेहान ने बताया कि कोरोना काल में यह काम भी बंद हो गया था। किसी तरह कर्ज लेकर दो समय भोजन का इंतजाम हो पाता था। अब कर्फ्यू खुलने के बाद दोगुना मेहनत करते हैं। जिससे कर्ज भी चुका लें और परिवार का खर्चा भी चले।