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एसआरआई सिस्टम से बढ़ेगी धान की उपज

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अनियमित मानसून चक्र की आशंकाओं को देखते हुए धान की खेती के लिए एसआरआई पद्धति अत्यंत कारगर सिद्ध होती है। इस सिस्टम से धान की खेती करने से 20 से 30 प्रतिशत तक उत्पादकता बढ़ जाती है। सिस्टम में आठ से 12 दिन के पौधों की रोपाई वर्ग के चारों कोनों पर 25 सेंटीमीटर में की जाती है। कृषि वैज्ञानिक एसआरआई (श्री) पद्धति में पानी बीज की बचत के साथ उर्वरकों की बचत की वकालत करते हैं।
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मानसून चक्र अनियमितता के बीच धान की खेती के लिए एसआरआई यानी सिस्टम आफ राइस इंसेंटिफिकेशन पद्धति अत्यंत कारगर है। इस सिस्टम में धान की नर्सरी डालते समय ही गोबर की खाद, हरी खाद का प्रयोग किया जाता है। आठ से 10 दिन की नर्सरी के पौधों को उखाड़कर 25 गुणे 25 सेंटीमीटर की दूरी पर तीन से चार पौधों की रोपाई लाइन से की जाती है। खरपतवार नष्ट करने के लिए कोनो वीडर का प्रयोग किया जाता है। एसआरआई सिस्टम से धान की खेती से मृदा शोधन उत्पादकता में वृद्धि जल उपयोग दक्षता उर्वरकों की बचत तथा उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत की बचत की जा सकती है। एसआरआई सिस्टम से खेती के लिए मध्यम एवं भारी भूमि जहां जल निकासी की उत्तम व्यवस्था हो प्रयोग में लाई जाती है। जलजमाव वाली भूमि या उरु टीली भूमि इस पद्धति के लिए उपयुक्त नहीं होती। काशी हिंदू विश्वविद्यालय कृषि विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक प्रोफेसर आरपी सिंह ने कहा कि एसआरआइ सिस्टम से खेती करने पर एक हेक्टेयर के लिए मात्र छह किलोग्राम बीज लगता है। उर्वरकों की 30 से 40 प्रतिशत तक बचत होती है। सिंचाई में 50 प्रतिशत कम पानी की जरूरत पड़ती है। फसल जल्दी तैयार होती है और उत्पादकता 30 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। बीएचयू के कृषि विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर रमेश चंद्र ने कहा कि श्री सिस्टम की खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 15 टन गोबर या कंपोस्ट की खाद और हरी खाद के लिए सनई ढैचा की 15 दिन की फसल को पलट कर पानी भरे। इसके अतिरिक्त धान की रोपाई के बाद रासायनिक उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करें।
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