कंदवा। क्षेत्र के चिरईगांव में कर्मनाशा नदी के तट पर स्थित मां रेहड़ा भगवती का मंदिर नवरात्र में आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि यहां मां के दर्शन से सभी मुरादें पूरी होती हैं।
मंदिर पर क्षेत्रीय लोगों के अलावा बिहार, झारखंड और मप्र से श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। वैसे तो दर्शन के लिए हमेशा भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्र में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुटती है। माता का यह मंदिर धार्मिक और पौराणिक इतिहास समेटे हुए है।
रेहड़ा भगवती का इतिहास रेहड़ा जंगल से जुड़ा हुआ है। मंदिर की स्थापना के बारे में गांव के बुजुर्गों का कहना है कि करीब 450 वर्ष पूर्व रेहड़ा के जंगल में पशुओं को चराते समय चरवाहों को मां की प्रतिमा जमीन में धंसी हुई दिखी थी।
कुछ समय बाद प्रतिमा जमीन के ऊपर दिखने लगी। यह बात चरवाहों ने गांव के लोगों से बताई तो वे वहां पहुंचे और तभी से वहां पूजन-अर्चन शुरू कर दिए। गांव वालों ने पहले वहां एक छोटा सा मंदिर बनवाया था जहां फक्कड़ बाबा पुजारी थे। मंदिर के बगल में बनी फक्कड़ बाबा की समाधि आज भी है।
वर्ष 2014 त्रिदंडी स्वामी के शिष्य सुंदरराज ने यहां भव्य लक्ष्मी-नारायण महायज्ञ कराया था। गांव के लोगों का मानना है कि इसके बाद मंदिर के प्रति भक्ति की ऐसी अलख जगी कि कई गांव वाले मां की भक्ति में लीन हो गए। इसके बाद गांव के लोगों ने छोटे मंदिर की जगह काफी भव्य मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर के पुजारी दीनानाथ पांडेय ने बताया कि मां रेहड़ा भगवती की मंदिर में क्षेत्र के साथ बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए आते हैं।