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Chandauli News: 19 गांवों के 10 हजार से ज्यादा लोग आर्सेनिकयुक्त पानी पीने के लिए मजबूर

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पीडीडीयू नगर। जिले में गंगा के किनारे के 19 गांवों के 10 हजार से ज्यादा लोग आज भी आर्सेनिकयुक्त पानी पीने के लिए मजबूर हैं। गंगा नदी के तट पर बसे गांवों के भूगर्भ जल में आर्सेनिक की ज्यादा मात्रा मिलना चिंता का विषय बना हुआ है। 12 साल से जल निगम इन क्षेत्रों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के प्रयास में जुटा हुआ है, लेकिन अभी पूरी सफलता नहीं मिल पाई है।
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वर्ष 2008 में जिले में गंगा के किनारे बसे दर्जन भर गांवों में हुए सर्वे में पाया गया था कि 19 गांवों के लोग आर्सेनिकयुक्त पानी का उपयोग कर रहे हैं। इसके बाद से तमाम प्रयास हुए, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो पाया। पेयजल की शुद्धता मापने के लिए वर्ष 2008 में गंगा नदी के किनारे बसे पड़ाव और चहनिया क्षेत्र के गांवों में केंद्र सरकार की ओर से सर्वे कराया गया था। इस दौरान दोनों क्षेत्रों के दर्जनभर गांवों की 19 बस्तियों में भूगर्भ जल में आर्सेनिक की मात्रा मानक से ज्यादा मिली थी। इन गांवों में पड़ाव क्षेत्र के बहादुरपुर, मड़िया, चौरहट व कटेसर, चहनिया ब्लॉक के सोनबरसा, टांडाकला, कैली सहित अन्य गांवों की 19 बस्तियों के भूगर्भ जल में आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा मिली थी। इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से वाटर क्वालिटी प्रोग्राम के तहत इन गांवों के लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए ट्यूबवेल लगाए जाने की योजना पर काम शुरू किया गया। वर्ष 2012 के अंत तक नादी-निधौरा, पूरा, पलिया, टांडाकला, कैली, बहादुरपुर व कटेसर में भूगर्भ जल की जांच के बाद ट्यूबवेल के सहारे पेयजल की आपूर्ति शुरू की गई। उधर, आबादी ज्यादा होने के कारण सूजाबाद पेयजल योजना के तहत पांच ट्यूबवेल लगाए गए, लेकिन बाद में ये भी खराब हो गए। ऐसे में आज भी यहां के लोग हैंडपंप का आर्सेनिकयुक्त पानी पीने के लिए मजबूर हैं। जल निगम के अधिकारियों के अनुसार गंगा के तटवर्ती गांवों में बच्चों में चर्म रोग की शिकायत मिलने के बाद 2008 भूगर्भ जल का सर्वे कराया गया था। साधारण पानी में आर्सेनिक की मात्रा 0.01 फीसदी प्रति लीटर होनी चाहिए, लेकिन इन बस्तियों के पानी की जांच आर्सेनिक की मात्रा 0.03 फीसदी मिली थी। इससे बच्चों की त्वचा पर चकत्ते पड़ जाते थे। बड़े भी पेट की बीमारियों से पीड़ित रहते थे। अधिकारियों के अनुसार आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा होने पर ब्लड कैंसर का खतरा बना रहता है।
चंदौली में गंगा के किनारे बसा एक गांव ऐसा है, जहां हैंडपंप से निकलने वाला पानी पांच मिनट में पीला हो जाता है। इस पानी के सेवन से ग्रामीण अक्सर बीमार रहा करते थे, लेकिन जब से हैंडपंप के पानी में आर्सेनिक होने की बात सामने आई है और इस पानी के सेवन से पेट व त्वचा संबंधी बीमारियों का ग्रामीणों को एहसास हुआ तो ग्रामीणों ने इसका सेवन बंद कर दिया। दैनिक कार्यों में इस पानी का ग्रामीण उपयोग करते हैं। लगभग तीन हजार की आबादी वाले चहनिया के सोनबरसा गांव में यह समस्या 10 साल से चली आ रही है। गांव में लगभग 20 हैंडपंप लगे हैं। सारे हैंडपंप का पानी कुछ समय बाद पीले रंग का हो जाता है और इससे दुर्गंध निकलती है। जल निगम ग्रामीण के सहायक अभियंता सीताराम यादव का कहना है कि आर्सेनिकयुक्त पानी न मिले, इसके लिए डीप बोर कराना ही समस्या का समाधान है। इसके लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। मंजूरी मिलने के बाद इन गांवों में डीप बोर कराया जाएगा।
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