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प्रभु भाव के भूखे

Fri, 30 Jan 2015 01:45 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला चंदौली
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प्रभु भोग के नहीं, बल्कि भाव के भूखे होते हैं। प्रभु की पूजा-अर्चना में जिस मनुष्य का मन न लगे, तो समझ लेना चाहिए कि प्रभु उससे दूर हो रहे हैं।
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यह उद्गार नागा बाबा कमौली वाले गुरुवार को कसवढ़-डेहरियाडीह सूर्य मंदिर प्रांगण में चल रहे श्रीमदभागवत कथा के अंतिम दिन व्यक्त किया।


उन्होंने कहा कि यदि जीवन को सार्थक बनाना है तो सद्गुरुओं की बात अवश्य मानें। संत-महात्माओं ने जीवन जीने के लिए कुछ नियम बनाए हैं।

यदि मनुष्य उन लक्ष्मण रेखाओं का उल्लंघन न करे तो जीवन सहज और सरल हो जाएगा। माता सीता ने लक्ष्मण रेखा को लांघा इसलिए राम-रावण युध्द हुआ। 

महंत महेश्वरदास जी ने कहा कि वामन अवतार के समय जब राजा बलि की पुत्री रत्नमाला ने भगवान वामन को देखा, तो उसके हृदय में विचार आया कि यदि ऐसा सुंदर बालक मेरा होता, तो उसे स्तनपान कराती तो मेरा जीवन धन्य हो जाता।

वामन अवतार भगवान विष्णु ने अपने भक्त राक्षसराज बलि की पुत्री रत्नमाला की इक्षा की पूर्ति द्वापर युग में किया। द्वापर युग में रत्नमाला पुतना राक्षसी हुई और कृष्ण को स्तनपान कराने से उसके मनोरथ की पूर्ति हुई।
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कहा कि भागवत कथा सुनने से मनुष्य के सभी पाप और कष्ट दूर होते हैं और वह मोक्ष को प्राप्त होता है। इस अवसर पर गणेशदास महाराज, चंद्रमौली मुनि उदासीन, शुकदेवदास जी महाराज, धर्मवीर यादव, ज्ञानेंद्र यादव, चंद्रशेखर उपाध्याय एवं चंद्रशेखर यादव आदि उपस्थित थे।
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