इलिया कस्बे में बस स्टैंड के पास सूखा पड़ा एक कुआं।
प्रकृति के संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का असर अब पूरे विश्व के सामने आने लगा है। जल, जंगल, जमीन और पहाड़ पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। प्राकृतिक दृष्टि से कभी समृद्ध रहा चंदौली जिला भी इससे अछूता नहीं है।
प्रकृति के विभिन्न संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण संकट तेजी से बढ़ रहा है। इसके कारण जलवायु परिवर्तन की स्थिति बन गई है। असमय बाढ़, सूखे जैसी स्थिति से खेती भी अब घाटे का सौदा बन गई है। जिले की पौने दो लाख हेक्टेयर कृषि भूमि का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा पिछले दो दशकों में कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुका है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून चक्र अनियमित हो गया है तथा बरसात में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी हर वर्ष दिखाई दे रही है। दो दशक पहले तक जिले में औसत बरसात 1050 मिमी होती थी लेकिन वर्तमान में घटकर 500 से 530 के बीच रह गई है। बांधों में पानी नहीं है तथा कर्मनाशा, चंद्रप्रभा, गरई नदियां सूख गई हैं। गंगा में भी पानी का अभूतपूर्व संकट खड़ा है। भूगर्भीय जल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। इससे भूगर्भीय जलस्तर में मैदानी क्षेत्रों में एक से डेढ़ मीटर तथा पहाड़ी क्षेत्र में दो से तीन मीटर तक की गिरावट हर वर्ष दर्ज की जा रही है। इस संबंध में पर्यावरण विद परशुराम सिंह का कहना है कि जिले में सड़कों के चौड़ीकरण के दौरान हजारों वृक्षों को काटा गया। उनकी जगह पर नए पौधे नहीं लगाए गए। दूसरी तरफ नौगढ़ वन के रेंजर शमशुलहुदा का कहना है कि जनपद में वनों की दशा सुधारने का लगातार प्रयास चल रहा है। इसके लिए बड़े पैमाने पर वनों में पौधे लगाए जाते हैं।