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श्रीमद्भागवत मुक्ति के सत्संग की प्रयोगशाला

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चंदौली में कथावाचक सुंदरराज महाराज ने कहा कि श्रीमद्भागवत मुक्ति का सोपान ग्रंथ और सत्संग एक प्रयोगशाला है। इसमें मानव मात्र को समस्त मानवीय गुणों से संस्कारित किया जाता है। जिस प्रकार से कच्चे ईंट को भट्ठे के माध्यम से परिपक्व किया जाता है उसी प्रकार मनुष्य को भागवत कथा के माध्यम से सच्चा मानव बनने की शिक्षा दी जाती है।
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यह बातें चिरईगांव में चल रहे चातुर्मास यज्ञ के दौरान सोमवार को त्रिदंडी स्वामी के शिष्य सुंदर राज महाराज ने कहीं। कथा को विस्तार देते हुए कहा से शरीर से तो सब मनुष्य हैं परंतु विचारों से उनके अंदर राक्षसी प्रवृत्ति आ गई है जो सत्संग और शास्त्र के माध्यम से ही दूर हो सकती है। शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य, काग भुषुडी, परीक्षित जैसे लोगों को भी शास्त्र व सत्संग की आवश्यकता पड़ी। आज के मानव यदि सत्संग से दूर हो जाएंगे तो निश्चित ही असुर प्रवृत्ति जागृत हो जाएगी और वे पतित व भ्रष्ट हो जाएंगे। उन्होंने धुंधकारी का उदाहरण देते हुए कहा कि धुंधकारी सत्संग व शास्त्र से दूर रहा जिससे वह बुरे कर्मों में लीन हो गया। अपने लोक और परलोक दोनों को संवारना है तो शास्त्रों के देखरेख में सत्संगमय जीवन व्यतीत करना होगा वरना लोग पथभ्रष्ट हो जाएंगे।
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