जिले में मदरसों की हालत बहुत अच्छी नहीं है।
जिन मदरसों को सरकारी
अनुदान मिलता है, वहां भी बच्चों के रहने, खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था
नहीं है। सरकारी अनुदान तो शिक्षकों के वेतन पर भी खर्च हो जाता है।
यहां
रहने वाले बच्चों के भोजन की व्यवस्था चंदे के सहारे होती है। जिले में दो
अनुदानित और 31 गैर अनुदानित मदरसे हैं। जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के
तहत आने वाले मदरसों के देख भाल पर सरकारी स्तर पर ध्यान नहीं दिया जा रहा
है।
एक तरफ तो मदरसों का आधुनिक बनाने की बात चल रही है, लेकिन अधिकांश
मदरसों में विवाद की वजह से यहां रहने वाले बच्चों की उचित देख भाल नहीं
हो रही है।
वैसे तो मदरसों का संचालन प्रबंध समिति करती है, लेकिन लाइसेंस
देने की जिम्मेदारी अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के पास है। परंतु धार्मिक आधार
पर संचालित होने की वजह से विभाग अधिक अंकुश नहीं लगा पाता है। जिन मदरसों
को अनुदान भी मिलता है, तो सिर्फ शिक्षकों के वेतन पर ही खर्च होता है।
इस
वजह से मदरसों की बेहतरी पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा सकता है। जिले में
कुल 33 मदरसे हैं, लेकिन इसमें धानापुर स्थित मदरसा मिसबाहुल उलूम में पचास
बच्चे रहकर पढ़ते हैं, जबकि तीन सौ बच्चे प्रतिदिन आकर पढ़ते हैं।
यह
दो मंजिला भवन में यह संचालित है।
लेकिन अनुदान के नाम पर यहां सिर्फ
अध्यापकों को मानदेय दिया जाता है। बाकी का काम चंदे के सहारे होता है। यही
कारण है कि बच्चों को न तो मैन्यू के हिसाब से भोजन मिल पाता है और न ही
सोने की अच्छी व्यवस्था है।
विवाद की वजह से मदरसा के संचालन की जिम्मेदारी
सीधे जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के हाथ में है। यही हाल चकिया स्थित
मदरसा उलूूम असदतिया पुरानी चकिया की है। यहां 350 बच्चे शिक्षा ग्रहण करते
हैं, जबकि एक दर्जन बच्चे यहीं रहकर पढ़ाई करते हैं।
प्रबंधक असिर्फुर
रहमान ने बताया कि यहां तैनात 35 शिक्षकों को वेतन अनुदान के आधार पर मिलता
है जबकि अन्य खर्च चंदे के सहारे चलता है। बगैर अनुदान वाले मदरसों की
स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है।